जिंदगी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


ये जिंदगी भी क्या है,

बीते लम्हो का संसार

बाकी लम्हो का संसार

सुहाने से मनमोहक क्षण

कड़वे नीम से भुलाए पल


ये ज़िन्दगी भी क्या है

लम्हे कब चलते चलते,

ठहर जाये,क्या पता

रुक के ऐसा रुके कि 

चलने का नाम न ले फिर ।


ये ज़िन्दगी भी क्या है

महज एक खिलौना है 

कब बिखर कर टूट जाये

क्या भरोसा इस पल का

लम्हो को जी लो, जी भर ।


ये ज़िन्दगी भी क्या है

सपना है मीठा सा या,

बच्चे की सलोनी कल्पना

झकझोरने से माँ के 

छिन्न-भिन्न हो बिखर जाये जैसे ।


ये ज़िन्दगी भी क्या है

हो न हो ज़िन्दगी है  

पेड़ से झड़े पत्तों की तरह

सुबह हो या शाम  

कोई रौंदता चला जाता है उसे 

अपने में लीन ।


ये ज़िन्दगी भी क्या है

जिंदगी जो भी हो

हम फिर ठहरा लम्हा दौड़ाएंगे

टूटा खिलौना फिर बनेगा, प्यारा खिलौना

फिर, कोई बच्चा देखेगा सपना 

शायद, हाँ, फिर --

ये जिंदगी होगी गुलजार!!!


स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर