रेल चली भई रेल चली
हंसी ठिठोली करती नदियां। झूम रही बागों की कलियां।
खेत खलिहान लहलहा रहें हैं। झरने मीठे स्वर गा रहे हैं।
पंछी फुर्र से उड़े जा रहे हैं। पेड़ों पर जा अठखेल रहे हैं I
आती जाती रेलों को टुकुर-टुकुर क्यों देख रहें हैं।
रेल चली भई रेल चली
छुक - छुक रेल चल रही। धड़-धड़ पहिये बोले।
पटरी रानी बड़ी सयानी ।कभी ना करती तुम मनमानी।
सबको अपने उपर तुम ले जाती। कितनों को तुम
चलता करती। उफ ना करती आह ना भारती। पहिये
तुम पर हरदम दौड़ें, बिन पटरी तुम सूनी हो। तुमसे मेरा
मेल यहीं हैं। तुम जिन रेलम पेल नहीं है।
रेल चली भई रेल चली
हरी झंडी दिख जाती है, तब आगे बढ़ जाती है।
लाल झंडी दिख जाये तो, झट पट यह रुक जाती है।
पटरी के संग मिल- मिल कर।रेल दे रही हमको शिक्षा।
गति को लय बना कर तुमको निर्बाध गति से चलना है।
भैया,जीवन की पटरी पर तुमको रेल जैसा चलना है।
रेल चली भई रेल चली
चंदा दौड़ रहा है संग-संग।सूरज भी रहता संग हरदम।
तेज हवा के झोंके आते।पैगाम सुनहरा लेकर आते।
जल्दी-जल्दी सामान सम्हालो। स्टेशन नजदीक आगया।
नाना के घर जाना है। दूध-मलाई,मक्खन खाना ।
मक्खन खाकर इसी रेल से हमको फिर वापस आना है।
श्रीमती रमा निगम
वरिष्ठ साहित्यकार भोपाल म.प्र.
nigam.ramanigam@gmail.com