मेरा प्रेम

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


अपने प्रिय को देख निकट 

जब हृदय प्रफुल्लित हो जाए, 

और यू लगे एक पल को 

सारी धरती थम जाए,

फिर कोई न दिखे प्रिय सा 

सुंदर और मनोहर ,शांत 

ये मन फिर रमने लगे एकांत,

प्रतीत यू हो की सूरज अब 

उत्तर का वासी है,

मेरे प्रिए की गली में ही 

कावा और काशी है,

तब जीवन कुसुम खिला सा लगता ,

कितने ही भाव आंदोलित हो जाते है ..….

परन्तु ये केवल भ्रांति है,

जीवन में प्रेम एक अद्भुत क्रांति है|

यह हिलोर है,शांत समुंद्र में ज्यों रत्न,

किसी बड़भागी के ही लगता यह अंक,

फिर एक मनुष्य ,मनुष्य नहीं देव हो जाता है, 

क्योंकि उसके शब्दो में 

वह असीम ही बोल रहा, 

उसके नर्तन मे' प्रेम रस' वह घोल रहा,

फिर सभी भय ,समाप्त हो जाते,     

क्योंकि वह प्रेममय हो जाता क्योंकि वह प्रेममय हो जाता !!


अंजनी द्विवेदी( काव्या)

देवरिया ,उत्तर प्रदेश