अपनी अपनी टोली

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


पहली टोली वह है 

जिसमें शामिल होने के लिए

वर्ण, जाति और गोत्र है जरूरी

रंग और लिंग भी है आवश्यक

इसमें शामिल साहित्यकार

काव्यशास्त्र के ज्ञाता

व्याकरण में निपुण

उनकी पत्रिका में शामिल होते हैं  केवल और केवल

उनकी टोली के साहित्यकार

इनका ही है सरकारी अकादमियों पर अधिकार

सरकारी साहित्यिक सम्मान पर एकाधिकार

इस टोली को मिलता है ज्ञान 

संस्कृत के समस्त ग्रन्थों से

धर्म-ग्रन्थों, महापुराणों से

इस टोली के ज्ञानी कहलाते हैं आचार्य।


दूसरी टोली भी है इनमें

जिसमें शामिल होते वही मूर्द्धन्य रचनाकार

जो पढ़ते पहली टोली का लिखा साहित्य

उनको निरखते और गुनते हैं

उसका भावार्थ निकालते हैं

बड़े बड़े आचार्यों को बना कर अपना गुरु

उनके लिखे पर देते अपनी टिप्पणियां

इस टोली के ज्ञानी कहलाते हैं आलोचक।


मौजूद है एक तीसरी टोली भी

जो करते हैं पालन मन से

पहली और दूसरी टोली द्वारा स्थापित नियामक 

गढ़े हुए सिद्धान्त का

ह्दय से करते हैं स्वागत

आचार्यों और आलोचक का बन कर कृपापात्र

इस टोली के ज्ञानी कहलाते सम्पादक।


वैसे तो एक चौथी टोली भी मौजूद है 

जो नहीं मानते पहले वाले आचार्य को

ना उनके नियामक हो

ना उनके व्याकरण को

ना मानते आलोचक को

ना मानते सम्पादक को

क्योंकि ये सपने देख कर नहीं रचते 

भोगे सत्य को ही रचते हैं 

दर्द और वेदना सपने देख कर नहीं 

लिखे जा सकते

इसलिए ये लिखते हैं विद्रोह की बात

नकार देते हैं सबको।


बस इसी बात को लेकर

पहले, दूसरे  और तीसरे वाले

हैं बहुत दुःखी कि

देख कर चौथी टोली को

भुनभुनाते रहते कि

पनप गए है बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह

सोशल साहित्यकार

सोशल मीडिया पर

लिखते हैं तुरंता काव्य

और करते हैं हम ज्ञानियों से ठिठोली

क्योंकि

अब सब ने बना ली है

अपनी अपनी टोली।


--- सन्तोष पटेल

नई दिल्ली