हे कागज़ के टुकड़े! महाप्रभु चिट्ठी जी! आशा करता हूँ कि अब मुझे आपका कुशल समाचार पूछने की आवश्यकता नहीं है। कबूतर जा जा जा भी गाने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी। सेलफोन टॉवर की मार से जिस तरह चिड़िया गायब हो गई ठीक उसी तरह सेलफोन के अवतार से आपके दर्शन दुर्लभ हो गए। हमें एकदम से छोड़कर आप कहाँ चले गए। हम आपके विरह में तड़पना चाहते हैं, लेकिन सेलफोन तड़पने नहीं देता। क्या करें मजबूर हैं। आप होते तो बड़ा अच्छा होता। जब तक आप थे तब तक झूठ हमसे कोसों दूर था। सेलफोन के आ जाने से झूठ बोलना हमारी फितरत सी बन गई है। कभी-कभी संदेह होता है कि हमारे शरीर में खून नहीं झूठ दौड़ता है। सेलफोन में लिखना कम बोलना ज्यादा होता है, इसलिए झूठ बोले बिना हमारा गुजारा मुश्किल है। बॉस, पत्नी, उधारी वालों ने यदि पूछ लिया कि आप कहाँ हैं? तो बेशर्मी से उत्तर दे दिया – मैं यहाँ नहीं हूँ। हैदराबाद में रहकर मुरादाबाद, नागपुर में रहकर कानपुर, बंबई में रहकर दुबई कहना भेड़चाल का हिस्सा बन गया है।
हमने सोचा था कि यह नेटवर्क हमें जोड़ने का काम करेगा। हमें कहाँ पता था कि यह हमीं को आपसे दूर कर देगा। आज आप होते तो हमारी तरक्की देखकर ईर्ष्या करते। आज लोग अगल-बगल में रहकर भी एक-दूसरे को नहीं देखते। फोन पर ही बात कर लेते हैं। एक समय था जब सिर उठाकर जीना शान की बात हुआ करती थी। अब कानों से फोन चेपे हुए टेढ़ी गर्दन व्यस्तताभरी शान का परिचायक है। हाँ अब भी कुछ बूढ़े लोग हैं, जिनके पास फोन तो हैं, लेकिन बात करने वाला कोई नहीं है। ऐसे लोगों के पास फोन रहकर उसकी घंटी न बजने की पीड़ा अधिक चोट पहुँचाती है। चिट्ठी जी आपके बदन पर लिखते समय हाथों में कलम का स्पर्श और हृदय में विचारों का सौंदर्य अजीब खुशी दिया करती थी। वहीं फोन पर बात करते समय हाथ में तराजु लिये शब्द तोल-तोलकर बात करना पड़ता है। भीतर कुछ और बाहर कुछ बोलने में सिद्धहस्तता हासिल करनी पड़ती है।
एक समय के लिए लगा कि चलिए संचार क्रांति के इस युग में लिखने की बला तो टली। कागज-कलम की बचत तो हुई। टाइप करना आसान लगा। सोचा जो आप पर लिखते थे, वही इस पर लिखा करेंगे। लेकिन हम अजगर करे न चाकरी की तर्ज पर एक कोने में बैठे-बैठे तोंद का ग्लोब बढ़ाते हुए संदेशा टाइप करने में भी फिसड्डी साबित हुए। किसी का भेजा हुआ संदेशा टरकाने को उपलब्धि मानने लगे। फॉरवर्ड-फॉरवर्ड का खेल खेलने में मजा आने लगा। बिना सिर-पैर के चित्र, उटपटांग वीडियो साझा करना और बंदरों की तरह खी-खी-खी-खी हँसना हमारे बुद्धिजीवी होने का प्रतीक बनने लगा।
अब पहले जैसी बात नहीं रही। हृदय के कुँए में शब्दों का पानी नहीं रहा। अब हृदय से नहीं मुँह से बात करते हैं। शब्दों में अक्षर हैं, लेकिन संवेदनाएँ शून्य हैं। इंसानी रिश्ते धीरे-धीरे बनावटी, नकली और खोखले बनते जा रहे हैं। हे चिट्ठी! एक बार फिर आप लौट आएँ और आते-आते प्रेमिका का प्यार, सिपाही का माँ के नाम लिखा संदेशा और किसी की नौकरी वाली खुशखबरी अवश्य लाना। हमें विश्वास है कि मानवीय मूल्यों की तुलना में आपके लुप्त होने का वेग अभी भी कम है। विश्वास है कि आप फिर से लौटकर आयेंगे।
डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657