ये बारिशों का मौसम भी
बड़ा ही उदास करता है,
यादों के वर्क़ पलटूं तो,
मेरा माज़ी उदास करता है,
मैं उसको पुकार ही लेता,
सावन भी उदास करता है,
सनम आखिर बेवफ़ा निकले
हर सजदा उदास करता है,
टूट ही जएगा कभी सय्याद,
ये ग़ुरूर भी तेरा एक दिन,
परिंदा परों में अपने हरदम,
उड़ने की ऊंची उड़ान रखता है,
बहुत संग दिल थे ,कम्बख़्त,
वो हमको भूल जाने वाले भी,
मुहब्बत का हर लम्हा मुश्ताक़,
आज भी ज़बानी याद रहता है,
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,,,,
सहज़ हरदा,,,,,,,,,,,,,
मध्यप्रदेश,,,,,,,,,,,,,,,