यादगार पल

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

मन मयूर अर्थात् हमारा मन तो मयूर यानि मोर की तरह है। जब खुश होता है तो मयूर की तरह पंख फैला कर नाचने लगता है । है ना बाबला । किसी प्यार के भूखे को प्यार करके देखो एक असीम आनन्द मिलेगा । जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं कि उनको सजों कर हम याद करके ही खुश होते हैं। आजकल मै कुछ अवसाद में आ जाती हूँ । 

जिन्दगी के दिन तो एक एक करके हाथ से फिसल रहे हैं पर कभी इन्हीं फिसलते पलों में कुछ ऐसा भी घट जाता है कि मन अन्दर तक भीग जाता है और वह पल शायद हमकों 20 साल पीछे पहुंचा देते हैं। अभी पिछली साल कोरोना अवसाद से थोड़ा थोड़ा उबर रही थी कि बड़ी बेटी का बोम्बे से फोन आया कि आप नोयडा आजाओ । बेटा और छोटी बेटी नोयडा है। मै और पति देव ने सोचा दो साल बहुत बुरे कटे हैं बच्चे आ नहीं पा रहे थे और हम भी घर में ही बन्द थे बस चार पांच दिन बच्चों के साथ गुजार लेगें चले 

गये। उस दिन फादर डे था  शाम को पहुँचे सब बच्चे एक साथ देखकर मन नाच उठा क्योंकि मूल से अधिक ब्याज प्यारी होती है। बच्चो के बच्चे सब कितने बड़े हो गये मेरे हाथों में पलते पलते । बड़ा सा केक जो मेरी दोनों बेटी के बेटे लेकर आये । जब आवाज दी नानू आऒ मेरी छोटी बेटी बोली पापा आज फादर डे है आप और मां तो हमारे और हमारे बच्चों के वट वृक्ष हो । मै कितनी अभिभूत थी बता नहीं सकती मेरी छुटकी बोली दादा ही नहीं मेरी सहेली दादी भी केक काटेगी । सोच रही थी हे ईश्वर मेरा परिवार ऐसे ही रहे । ये यादें ही तो आजतक संजो रही हूँ सब साथ इकठ्ठे नहीं हो पाते । संजो लो इन पलो को अपने मन में ।

स्व रचित

डा. मधु आंधीवाल#

अलीगढ़ , madhuandhiwal53@gmail.com