ग़ज़ल : यूँ बगैर तेरे गुज़र न हो

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


यूँ बगैर तेरे गुज़र न हो, 

मेरी ज़िंदगी का सफर न हो। 


कभी तू जो मुझसे ख़फ़ा हुआ, 

मेरी रात की ही सहर न हो। 


मेरी आरज़ू है यही तुझे, 

मेरी मौत की भी खबर न हो। 


तू रहें जहां में कहीं मगर, 

जहां मैं रहूं तू उधर न हो। 


तेरे दिल में चाहे तड़प रहे, 

तेरे दर पे मेरी हज़र न हो। 


तुझे बेवफ़ा ये सज़ा मिले, 

तेरी ज़िंदगी का ज़रर न हो। 


मैं दिखा सकूं तुझे ज़िंदगी,

रही शादमाँ तू अगर न हो। 


प्रज्ञा देवले✍️