रिसर्च : वाहनों के आने-जाने से ग्लेशियर को खतरा, ब्लकै कार्बन के स्तर में वृद्धि

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

वाहनों के बढ़ने के कारण प्रदूषण पर तो असर पड़ रहा है, लेकिन हिमालय में भी ग्लेशियर सिकुड़ने लग गए हैं। हिमालयी क्षेत्र लद्दाख में ग्लेशियर सिकुड़ने शुरु हो गए हैं। इस क्षेत्र में भारतीय और चीन सैनिकों के लिए युद्ध का मैदान होने का कारण यहां वाहनों का आना-जाना लगा रहता है। हाल ही में 2000 से 2020 तक दो दशकों में देखे गए ग्लेशियरों पर अध्ययन किया गया। तो चलिए आपको बताते हैं कि रिसर्च में क्या साबित हुआ...

2000 से 2020 तक के ग्लेशियरों पर हुई रिसर्च

आपको बता दें कि लद्दाख के ग्लेशियरों पर हुआ अध्ययन पर्यावरण विज्ञान और प्रदूषण अनुसंधान पत्रिका के द्वारा प्रकाशिक किया गया। पश्चिमी हिमालय के द्रास बेसिन में हुई रिसर्च 2000 से 2020 तक दो दशकों में देखे गए 77 ग्लेशियरों की उपग्रह छवियों पर आधारित है। 

 ग्लेशियर घटकर 171.46 वर्ग किमी हुए 

जिन ग्लेशियरों को अध्ययन किया गया उनका आकार 0.27 वर्ग किमी से लेकर है। 2.30 वर्ग किमी के औसत आकार के साथ 14.01 वर्ग किमी सामने आया। जिसके अनुसार, यह साबित होता है कि ग्लेशियर क्षेत्र 176.77 वर्ग किमी से कम हो गया है। 2000 में ग्लेशियर का वर्ग आकार 171.46 वर्ग किमी था, जो कुल ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 3% हिस्सा है।

मलबे के कवर पर भी पड़ा प्रभाव 

हिमनद मंदी की गति 0.24%से लेकर 15% तक के हिमनदों में बहुत ही अलग होती है। ग्लेशियर 30 से 430 मीटर तक पीछे हटे हैं। इसका प्रभाव मलबे के कवर पर भी पड़ा है। साफ ग्लेशियरों में मलबे से ढके ग्लेशियरों की तुलना में 5% ज्यादा नुकसान हुआ है। रिसर्च में बताया गया कि औसत मोटाई में बदलाव और ग्लेशियरों को बड़े पैमाने पर हुआ नुकसान 1.27 से 1.08 मीटर रहा है।

रिसर्च में शामिल हुए 6 लोग 

ग्लेशियरों पर किए गए अध्ययन में 6 लोग शामिल हुए जिनमें से क्लाइमेटोलॉजिस्ट शकील अहमद रोमशू, खालिद उमर मुर्तजा, वहीद शाह, तौसीफ रमजान, उमर अमीन और मुस्तफा हमीद भट ने भाग लिया। शोध में पाया गया कि कम ऊंचाई पर हिमनदों में 4.10% की गिरावट आई है, जबकि मध्य और उच्च ऊंचाई पर हिमनदों में 3.23% और 1.46% की अवधि देखी गई है।

वाहनों के आने-जाने से पड़ा ग्लेशियरों पर असर 

रिसर्च में यह पाया गया कि भारी वाहनों के आने-जाने से और तेज गति के कारण ग्लेशियर घट रहे हैं। ब्लैक कार्बन सांद्रता 287 से 3,726 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर, औसतन 1,518 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के साथ थी। यह हिंदू कुश हिमालय में बाकी ऊंचाई वाले स्थानों में पाए गए ब्लैक कार्बन सांद्रता की तुलना में काफी ज्यादा है।

ब्लकै कार्बन की सांद्रता में हुई वृद्धि

1980 से 2020 तक ब्लैक कार्बन की सांद्रता 1984 में 338 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से बढ़कर 2020 में 634 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गई है। रिसर्चस से अनुमान लगा रहे हैं कि राष्ट्रीय राजमार्ग के पास होने के कारण ब्लैक कार्बन की सांद्रता की मात्रा बढ़ रही है। इसके अलावा अध्ययन में यह पाया गया कि भारी वाहन 60% ब्लैक कार्बन उत्सर्जन के बदलाव के लिए जिम्मेवार है।