गजल : ज़िन्दगी को मैं भी जीना जानती हूँ

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क   


ज़िन्दगी को मैं भी  जीना जानती हूँ

चाक दामन ख़ुद ही सीना जानती हूं


खींच लेता है वो मुर्दों से कफन को

आदमी  कितना कमीना जानती हूं


हरतरफ है ख़ौफ़का मंज़र यहां पर

है  बड़ा कातिल  महीना जानती हूँ


ओढ़ कर बैठा  शराफ़त  का लबादा

उसने किसका हक़है छीना जानती हूँ


दौलतों का ढ़ेर यह किसकी बदौलत

ख़ून  किसका  है  पसीना  जानती हूँ


गर  ठहर  जाये  यही  हालात  रश्मी

डूब   जायेगा   सफीना   जानती हूं!


रश्मि मिश्रा 'रश्मि'

भोपाल मध्यप्रदेश