विद्यया अमृतम् अश्नुते।

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

देश को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षण संस्थानों, शिक्षकों को कौशलता धारक मानव संसाधनों को तैयार करने की भावना को आत्मसत करना होगा 

पढ़ाई का मतलब केवल नौकरी करना एक विकार - हमें नौकरी करना नहीं, देने की भावना को आत्मसत करना होगा - एड किशन भावनानी

गोंदिया - भारत में आदि-अनादि काल से ही मानवीय बौद्धिक क्षमता का अभूतपूर्व ख़जाना रहा है या यूं कहें कि भारत की मिट्टी में ही ऐसी अद्भुत शक्ति समाई हुई है कि वह प्राकृतिक रूप से ही हर मानवीय जीवन में बौद्धिक क्षमता का प्रचुर डोज़ पैदा होने के समय से ही उसके मस्तिष्क में लगा देती है, परंतु हम मानवीय जीव अपने इस कौशलता रूपी डोज़ को नहीं पहचान पाते या विलंबित धारा में पहचान केवल महसूस करते हैं। एक भारतीय में गज़ब का टैलेंट, कॉन्फिडेंस और बौद्धिक क्षमता की विविधता होती है वह शायद ही वैश्विक स्तरपर किसी अन्य देश के किसी नागरिक में होगी!! यही कारण हैकि दुनिया में करीब-करीब हर देश में बड़ी तादाद में भारतीय अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर परचम लहरा रहे हैं!! जो हम टीवी चैनलों के माध्यम से पीएम के विदेश दौरों में अप्रवासी भारतीयों का हुजूम उमड़ा हुआ देखते हैं कि कितना खुशहाल और अभूतपूर्व सौहार्द्र के माहौल में पीएम उन्हें संबोधित करते हैं और हमारी कॉलर टाइट होती है!! हम गदगद होते हैं!! कि यह भी अप्रवासी हिंदुस्तानी हैं!! 

साथियों बात अगर हम  विद्यया अमृतम् अश्नुते। की करें तो अमृतकाल में देश के अमृत संकल्पों को पूरा करने की बड़ी जिम्मेदारी हमारी शिक्षा व्यवस्था पर है, हमारी युवा पीढ़ी पर है। हमारे यहाँ उपनिषदों में भी कहा गया है- विद्यया अमृतम् अश्नुते। अर्थात्, विद्या ही अमरत्व और अमृत तक लेकर जाती है। काशी को भी मोक्ष की नगरी इसीलिए कहते हैं क्योंकि हमारे यहाँ मुक्ति का एकमात्र मार्ग ज्ञान को, विद्या को ही माना गया है। 

साथियों बात अगर हम पुरानी सोच, पढ़ाई का मतलब नौकरी की करें तो पीएम ने एक कार्यक्रम में कहा, आप सभी जानते हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मूल आधार, शिक्षा को संकुचित सोच के दायरों से बाहर निकालना और उसे 21वीं सदी के आधुनिक विचारों से जोड़ना है। हमारे देश में मेधा की कभी कोई कमी नहीं रही है। लेकिन, दुर्भाग्य से हमारे यहाँ ऐसी व्यवस्था बना कर दी गई थी जिसमें पढ़ाई का मतलब केवल और केवल नौकरी ही माना जाने लगा था। शिक्षा में ये विकार गुलामी के कालखंड में अंग्रेजों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए, अपने लिए एक सेवक वर्ग तैयार करने के लिए किया था। आजादी के बाद, इसमें थोड़ा बहुत बदलाव हुआ भी लेकिन बहुत सारा बदलाव रह गया। अब अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था कभी भी भारत के मूल स्वभाव का हिस्सा नहीं थी और न हो सकती है। अगर हम हमारे देश के पुराने कालखंड की तरफ नजर करें। हमारे यहाँ शिक्षा में अलग-अलग कलाओं की धारणा थी। 

साथियों बात अगर हम देश को आगे बढ़ाने के लिए कौशलता धारक मानव संसाधनों की करें तो पीआईबी के अनुसार माननीय पीएम ने दिनांक 7 जुलाई 2022 को एक कार्यक्रम के संबोधन में कहा, शिक्षा में यही विविधता हमारी शिक्षा व्यवस्था का भी प्रेरणास्रोत होनी चाहिए। हम केवल डिग्री धारक युवा तैयार न करें, बल्कि देश को आगे बढ़ने के लिए जितने भी मानव संसाधनों की जरूरत हो, हमारी शिक्षा व्यवस्था वो देश को उपलब्ध करायें, देश को दे। इस संकल्प का नेतृत्व हमारे शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों को करना है। हमारे शिक्षक जितनी तेजी से इस भावना को आत्मसात करेंगे, छात्र-छात्राओं को देश के युवाओं को उतना ही ज्यादा, देश के आने वाले भविष्य को भी उतना ही ज्यादा लाभ होगा। 

उन्होंने कहा जब देश का मिजाज़ ऐसा हो, जब देश की रफ़्तार ऐसी हो तो हमें अपने युवाओं को भी खुली उड़ान के लिए नई ऊर्जा से भरना होगा। अभी तक स्कूल, कॉलेज और किताबें ये तय करते आये थे कि बच्चों को किस दिशा में जाना है। लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद अब युवाओं पर दायित्व और बढ़ गया है। और इसके साथ ही हमारी भी ये जिम्मेदारी बढ़ गई है कि हम युवाओं के सपनों और उड़ान को निरंतर प्रोत्साहित करें, उसके मन को समझें, उसकी आकांक्षाओं को समझें, तभी तो खाद पानी डाल पाएंगे। उसे समझे बिना कुछ भी थोपने वाला युग चला गया है दोस्तो। 

हमें इस बात का हमेशा ध्यान रखना होगा, हमें वैसा ही शिक्षण, वैसी ही स्ंस्थानों की व्यवस्थाएं, वैसा ही मानव संसाधन विकास का हमारा मिजाज, अपने आपको सज्ज करना ही होगा। नई नीति में पूरा फोकस बच्चों की प्रतिभा और चॉइस के हिसाब से उन्हें स्किल्ड बनाने पर है। हमारे युवा स्किल्ड हों, कॉन्फिडेंट हों, प्रैक्टिकल हो, कैलकुलेटिव  हो, शिक्षा नीति इसके लिए जमीन तैयार कर रही है। मुझे पूरा विश्वास है, आने वाले समय में भारत दुनिया में वैश्विक शिक्षा का एक बड़ा केंद्र बनकर उभर सकता है।

भारत न केवल दुनिया के युवाओं के लिए एजुकेशन डेस्टिनेशन बन सकता है, बल्कि दुनिया के देशों में भी हमारे युवाओं के लिए नए अवसर बन सकते हैं। इसके लिए हमें अपने एजुकेशन सिस्टम को इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स पर तैयार करना होगा। इस दिशा में देश लगातार प्रयास भी कर रहा है। हायर एजुकेशन को इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स के हिसाब से तैयार करने के लिए नए दिशा निर्देश जारी किये गए हैं। करीब 180 उच्च शिक्षा संस्थानों में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के लिए विशेष कार्यालय की स्थापना भी की गयी है। मैं चाहूँगा कि आप सभी इसी दिशा में न केवल जरूरी विमर्श करें, बल्कि भारत के बाहर की व्यवस्थाओं से भी परिचित होने का प्रयास करें। ये नई व्यवस्था, भारत की शिक्षा व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से भी जोड़ने में मदद करेंगी। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि विद्यया अमृतम् अश्नुते। देश को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा संस्थानों,शिक्षकों को कौशलता धारक मानव संसाधनों को तैयार करने की भावना को आत्मसत् करना होगा। पढ़ाई का मतलब केवल नौकरी करना एक विकार हैं, हमें नौकरी करना नहीं देने की भावना को आत्मसत करना होगा।

-संकलनकर्ता लेखक - कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र