बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जरूरी है, विकेन्द्रीकरण

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था इसलिए स्थापित की गई थी, ताकि प्रत्येक नागरिक को उसके निवास के निकट नि:शुल्क चिकित्सा सेवा उपलब्ध हो सके, किन्तु स्वतंत्रता के 75 वर्ष पश्चात लगभग आधे से अधिक व्यक्ति रोगग्रस्त होने पर निजी क्षेत्र के चिकित्सकों से उपचार प्राप्त करने के लिए विवश हैं। नतीजे में प्रति वर्ष करोड़ों परिवार निर्धनता की अवस्था में पहुंच जाते हैं।

 ऐसा क्या कारण है कि इतनी सुनियोजित तरीके से बनाई गई सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कार्य नहीं कर पा रही है? उसके विपरीत निजी क्षेत्र जो बाजार के आधार पर केवल बड़े नगरों तक सीमित है, इतनी बड़ी संख्या में नागरिकों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध करवा रहा है? भारत में जन साधारण के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का ढांचा राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित है, जबकि इसका संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। इसके लिए व्यय होने वाली कुल धनराशि का लगभग 30 प्रतिशत केंद्र और लगभग 70 प्रतिशत राज्य सरकारें व्यय करती हैं। 

नीतिगत ढांचा और संचालन सम्बन्धी अधिकतर निर्णय भी केंद्र सरकार के स्तर पर ही लिए जाते हैं। प्रारम्भ में केंद्रीकृत संचालन की आवश्यकता इसलिए थी, क्योंकि निचले स्तरों पर उतने प्रशिक्षित नियोजनकर्ता उपलब्ध नहीं थे, किन्तु सात दशक के बाद भी इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है जो यही प्रदर्शित करता है कि शायद यह सामर्थ्य और योग्यता निचले स्तर पर अभी भी नहीं बन पाई है। ऐसा मुश्किल से ही कोई राज्य होगा जिसने स्वास्थ्य सेवा संचालन सम्बन्धी कोई नीतिगत निर्णय अपने स्तर पर लिया हो और फिर जिला, उपखंड और चिकित्सा संस्थान स्तर पर तो निर्णय लेने की कोई क्षमता का कभी विकास ही नहीं हुआ है और ना ही उसके लिए कभी कोई प्रयत्न किए गए हैं। 

वैसे सन् 1993 से लागू संविधान के 73वें संशोधन में स्वास्थ्य संचालन का कार्य स्थानीय निकाय अर्थात् ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज और नगरों में नगर निकायों को हस्तांतरित करना था, किन्तु इसकी पालना किसी भी राज्य में नहीं हुई। स्थिति यह है कि केंद्रीय स्तर पर ही निश्चित होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाली आशा की क्या योग्यता होनी चाहिए, उसका चयन किस विधि से किया जाए, उसको किस प्रकार से किन विषयों पर किस तकनीक से प्रशिक्षित किया जाए। 

प्रशिक्षण हेतु समस्त पुस्तिकाएं भी केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों द्वारा ही बनाई और प्रकाशित की जाती हैं। चूंकि सभी कुछ केंद्रीय नियंत्रण में है और अन्य स्तरों पर केवल केंद्र के दिशा-निर्देशों का पालन करना है तो स्थानीय स्तर पर अपने विवेक के प्रयोग की कोई सम्भावना ही नहीं रहती। यह एक बड़ा कारण है कि स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य-कर्मियों के ज्ञान, कौशल और सबसे महत्वपूर्ण संवेदनशीलता एवं समर्पण से कार्य करने की सम्भावना पूर्ण रूप से अनुपस्थित रहती है। 

सार्वजनिक चिकित्सा संस्थानों में कार्यरत व्यक्ति स्थानीय सेवा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के प्रति अपने को जवाबदेह भी इसलिए नहीं मानते, क्योंकि उनका नियोक्ता राज्य अथवा केंद्र सरकारें हैं और जिनकी उनको सेवा करनी है उनकी उस स्तर तक कोई पहुंच नहीं है। राजकीय व्यवस्था पूर्ण कठोरता से पदानुक्रम आधार पर इस मानसिकता से संचालित होती है कि कनिष्ठ व्यक्ति को अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन करना है इसलिए कनिष्ठ व्यक्ति को वरिष्ठ से विपरीत अथवा भिन्न राय प्रदर्शित करना सम्भव ही नहीं है। यही कारण है कि राजकीय सेवा कर्मी अपनी क्रियात्मक योग्यता का उपयोग ही नहीं कर पाते, जिसके कारण शनैरू शनैरू उनकी यह क्षमता लुप्त हो जाती है और समस्त कार्य यांत्रिक, अनमने रूप से सम्पादित किए जाते हैं।

इसके विपरीत निजी क्षेत्र के व्यक्ति और चिकित्सा संस्थान स्थानीय स्तर पर स्वयं निर्णय लेते हैं और जो भी क्षमता है उसका अधिक-से-अधिक उपयोग करने का पूर्ण प्रयत्न करते हैं जिससे कि वे अधिक-से-अधिक आय अर्जित कर सकें। सार्वजनिक क्षेत्र के विपरीत निजी क्षेत्र के चिकित्सालय उन सभी साधनों का उपयोग करते हैं जिससे अधिक-से-अधिक रोगी उनके पास आएं। भारत में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संस्थान कार्यरत हैं एवं रोगी को स्वतंत्रता है कि वह किस क्षेत्र में अपना उपचार करवाए। 

ये दोनों प्रकार की व्यवस्थाएं अपने-अपने स्तर पर कार्य करती रही थीं, किन्तु पिछले तीन दशकों से केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा यह मानकर कि सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाएं सभी को चिकित्सा सेवा नहीं दे सकतीं, निजी क्षेत्र की सहभागिता प्राप्त की जाने लगी। यह सहभागिता अनेक रूपों में स्थापित की गई। जैसे, अनेक राज्यों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निजी संस्थानों को संचालन हेतु स्थानांतरित कर दिए गए। गम्भीर और अति-गम्भीर रोगियों हेतु सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं बनाई गईं जिसके प्रीमियम का भुगतान सरकारों द्वारा किया गया। अत्यंत चकित कर देने वाले रूप से श्राजकीय चिकित्सा संस्थानों को भी स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत लाया गया। 

इसके कारण सरकारी संस्थानों में भी दोहरी व्यवस्था हो गई-एक वे जो बीमित हैं और दूसरे वे जो बीमित नहीं हैं। ऐसे में सरकारी स्वास्थ्य संस्थान दिग्भ्रमित हैं कि वे इन दो श्रेणियों के रोगियों में किस प्रकार अंतर करें, क्या दो प्रकार के रोगियों को दो अलग प्रकार की गुणवत्ता की सेवाएं प्रदान की जाएं? इस प्रकार के कार्यकलाप जिनको सहभागिता बताया गया है, के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव इसलिए बढ़ा है क्योंकि यह स्पष्ट ही नहीं है कि किस प्रकार के रोगी, कहां उपचार हेतु जाएं। स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को इस नीति में कोई परिवर्तन करने की अनुमति नहीं है। 

अधिकतर राज्यों में राजकीय सेवा में कार्यरत चिकित्सक, चिकित्सालय समय के पश्चात अगर रोगोपचार हेतु सलाह देता है तो वह निश्चित राशि का शुल्क लेकर यह कर सकते हैं। इस तरह की व्यवस्था का बहुत अधिक दुरुपयोग अनेक प्रकार से होता है। जैसे अधिकतर चिकित्सक की यह भावना रहती है कि वह अधिक-से-अधिक रोगी चिकित्सालय समय के पश्चात शुल्क लेकर देखे जिससे कि उनको वेतन के अतिरिक्त भी आय हो। उसका प्रयत्न यही रहता कि जैसे ही चिकित्सालय का समय समाप्त हो, वहां से निकल जाए और देरी से आए। 

इसके अतिरिक्त चिकित्सक जब चिकित्सालय में रोगी उपचार हेतु दवाइयों की सलाह देता है तो वहां दवाइयों को उनके जैनेरिक नाम से उल्लेखित करता है जो चिकित्सालय से ही निःशुल्क प्राप्त हो जाती हैं, किन्तु जब शुल्क लेकर चिकित्सालय के बाहर दवाइयों का परामर्श देता है तब वह दवा कम्पनियों द्वारा दिए गए नामों, जिनको आम भाषा में ब्रांडेड कहते हैं, लिखता है जिनको कि बाजार में भारी मूल्य चुकाकर रोगी को खरीदना होता है। प्रतिस्पर्धा के कारण अधिकतर दवा कम्पनियां चिकित्सक को कमीशन देती हैं। इसके कारण चिकित्सक अक्सर अनावश्यक और कभी-कभी तो असंगत दवा लेने की सलाह भी देते हैं।

यह व्यवस्था चिकित्सक को सेवा-मुक्ति के पश्चात निजी परामर्श सेवा स्थापित करने में भी मदद करती है। इस दोहरी व्यवस्था के कारण समस्त राजकीय चिकित्सालय में रोगोपचार का कार्य अव्यवस्थित और अधूरी भावना से सम्पादित किया जाता है और रोगी को निजी क्षेत्र के चिकित्सकों से उपचार लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है। वर्तमान में देश में सभी तरह के राजकीय स्त्रोतों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग एक प्रतिशत स्वास्थ्य के लिए व्यय किया जाता है। 

यह राशि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए अपर्याप्त है और यही कारण है कि स्वास्थ्य सेवा के लिए आवश्यक भौतिक संसाधन अपर्याप्त, कमजोर गुणवत्ता वाले और अक्सर खराब होने पर बिना ठीक हुए ही पड़े रहते हैं। जो भवन बनाए जाते हैं उनका अपूर्ण रख-रखाव होने से अनुपयोगी हो जाते हैं और समस्त चिकित्सालय परिसर में गंदगी पसरी रहती है। 

ऐसा नहीं है कि उपरोक्त वर्णित बाधाओं का निराकरण नहीं किया जा सकता। अगर इच्छा-शक्ति हो और जन-दबाव बने तो उपलब्ध बजट में ही इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले राजकीय स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन का पूर्ण विकेंद्रीकरण करना आवश्यक है, अर्थात् केंद्र और राज्य सरकार ने जो कुछ अपने नियंत्रण में कर रखा है उसको उपखंड एवं जिला स्तर पर पूर्ण रूप से वहां के स्थानीय निकायों को सम्पूर्ण शक्तियों के साथ हस्तांतरित करना होगा। 

स्थानीय निकाय और चिकित्सा संस्थान प्रचलित रोग, उनकी भयावहता, प्रभावित परिवारों और व्यक्तियों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर स्वास्थ्य कार्यक्रम नियोजन कर उनको क्रियान्वित करने की योजना बनाकर अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र होंगे। समस्त प्रकार के निवारक, रोग-निदान और स्वास्थ्य शिक्षा के लिए भी वे कार्य योजना बनाकर क्रियान्वित कर सकेंगे। यह वास्तव में श्जनता का स्वास्थ्य, जनता के नियंत्रण में के उद्देश्य की पूर्ति करेगा।