प्रकृति

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

रजतकरों की मृदु तूलिका से गढ़कर,

पर्वतों,हरियाली, तुहिन का रंग भरकर,

प्रकृति को अद्भुत रूप दिया ईश्वर ने,

कोमल तरु कुसुम का सौरभ बनकर।

अलकों सी बेलें बिखरकर,

वेणी सी शाखों से लिपटकर,

मलय बयार में झूमे गाये,

निकले साज सरगम बनकर।

झूम उठते हैं भोले हरहर,

मधु बूँद बरसाते प्रसन्न होकर,

घनघोर घटा होती आच्छादित,

अंधकार छाता, नभ अंजन बनकर।

अनगढ़ पहाड़ियों से पगडंडियां निकलकर,

रस्ते बनाते स्वछन्द  और निर्मल,

कच्चे पक्के मकान, मृदु बोलियां,

लोचन अभिराम सरिता कलकल।

कितनी  मनोहर प्रकृति हरपल,

निर्मिमेष देखूँ ईश्वर की कृति सकल,

धन धान्य,फल फूल ये बरसाये, 

नीरव मन  शब्दों से देती है भर।

               रीमा सिन्हा (लखनऊ)