ग़ज़ल : इश्क़ की अब मुझे दवा भी दो

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


इश्क़ की अब मुझे दवा भी दो

मर न जाऊँ कोई दुआ भी दो


अब तलक मिल नहीं सके उनसे

ज़िंदगी से ख़ुदा मिला भी दो 


प्यार काफी नहीं है दिल के लिए

दे सको तो हमें वफ़ा भी दो


मयकदा भूल जाऊँ दिल से मैं

इस तरह आँखों से पिला भी दो 


प्यार मैं हूँ नहीं तुम्हारा गर

याद अब मेरी तुम भुला भी दो


जग गई तो बहुत ही मुश्किल है

ख़्वाहिशों को ए दिल सुला भी दो 


चाँद से रोशनी बिखर जाए

ज़ुल्फ़ चेहरे से तुम हटा भी दो


प्रज्ञा देवले✍️