आँसू (छप्पय छंद)

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  


हुआ अजूबा एक,बोलती ऑंखें देखी |

माँग़ रही कुछ और,मौन हैं इच्छा शेखी ||

चाहे जैसा कर्म, पुजारी दुनिया धन की |

आँसू पूजे धर्म, भिखारी कहते मन की ||

मिली प्रतिष्ठा आज जो,  उसका कोई मोल है |

झूठे सारे चेहरे, कहे सब अपने बोल है ||


हाय तपस्या आज, मौन क्यूँ तुम चिल्लाती |

जरा वेदना बोल, अश्रु बन क्यूँ बह जाती ||

ठहर गयी खुद आस,आँख अब भरती जाती |

मचली इकपल प्यास,नहीं धीरज रख पाती |

सावन  बरसे मेघ जब, नैनन बहती धार है |

एक भरोसा ईश है, वही लगावे पार है ||


कल्पना भदौरिया