राष्ट्रपति भवन से तिहाड़ जेल !-2

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

सुधेंदु पटेल

पगली-  घंटी 

मेरे  जैसे पत्रकारिता की बारादरी में हाल ही दाखिल होने वाले रंगरूट के लिए तिहाड़-प्रवास एक सुअवसर-सा ही रहा था | उस दौरान तिहाड़ में एक से एक नामी-बदनामी वाले हुनरमंदों का जमावड़ा संयोगात रहा था | एक ओर जहाँ देश की राजनीती-समाजनीति को दूर तक प्रभावित करने वाले थे तो दूसरी ओर दुनिया भर में अपनी करतूतों से पहचाने जाने वाले वर्तमान समय  के ललित मोदी और विजय माल्या सरीखों के 'बाप' टाइप आर्थिक-अपराधी भी शोभायमान थे | 

           तिहाड़ में सच में दिल खोलकर स्वागत करनेवालों में सबसे पहले प्रवेश करते ही मिले अकाली दल के साथी, जिनके जुझारूपन के हम हमेशा से मुरीद रहे हैं | तिहाड़ में उनकी संख्या का अनुमान जानने की लिए इतना जानना ही काफी होगा कि वहां 'निशान' फहराकर अकाली साथियों ने गुरद्वारा सा माहौल रच दिया था | रागी  सबद कीर्तन गाते जो हमेशा से अच्छा लगता रहा  है | उसी के  साथ कड़ा-प्रसाद की भी चौंचक व्यवस्था थी | कुछ ही घंटों में चंद अकाली अच्छे  दोस्त बन गए,रिश्ता बाद तक बना रहा था | यूँ  भी सरदार अपने पूरे धज के साथ बचपन से ही आकर्षिते  करते रहे हैं | कुलदीप आठवीं से दोस्त रहा जिसने मुझे कड़ा-कृपाण भेंट  किया था | कृपाण को तो मैं काफी  सालों तक भक्ति-भाव के   साथ लटकाए रह था | मेरे कलाई में कड़ा तो तब भी था, जिसे सालों-साल सोने का बनवाने का सपना पाले रहा | याद नहीं फिर कब कड़ा ही उतार दिया | मेरे अवचेतन में पांचवी में पढ़ते हुए डंडी-स्वामी से भेंट में मिली संतों की जीवनियों में गुरुनानक और कबीर  भी  थे | आकर्षण का कारण था कि महाराजा रणजीत सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर को बाईस मन सोना दान में दिया  था, जो आज भी शिखर पर चमक रहा है | दूसरा कबीर को रामानन्द जी मेरे पञ्चगंगा घाट पर भेंटाये  थे | जहां मैं रोज नहाता-तैरता रहा हूँ | शायद इसीलिए अकाली मंजीत में मैंने कुलदीप को पा लिया था | खैर |

     और अब चूड़ीदार पायजामा-शेरवानी वाले की बात , जिसे हम अखबारों की ख़बरों से जानते थे | लेकिन जेल में उसको मिली सुविधाओं से हमें चिढ़-सी हुयी | हम लोगों ने इस मसले पर अकाली दोस्तों से राय की और उसे तफरी के लिए जाने से रोकने की ठानी | हम सफल भी रहे | हमार्री छापामार रणनीति के खुलासे से  पहले यह तो जान लें की वो कौन था | वह था गुणी-तिकड़मी न्यूक्लियर फिजिक्स का मेधावी  स्कालर जयंती शिपिंग कारपोरेशन का सर्वेसर्वा डॉ.जयंती धर्म तेजा | यह जान कर किसी को भी हैरानी हो सकती है कि महात्मा गाँधी की उपस्थिति में मां सुरमा (जो दक्षिण भारत की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थी, जिसे पांच बार जेल की सजा हुई थी) ने अपने बेटे का नाम 'धर्म' रखा था | यह भी कि उसके विलक्षण पिता जयंती वेंकट  नारायण तेजा 'सती-प्रथा' उन्मूलन के प्रेरक राजा राम मोहन राय के साथी और 'ब्रह्मों समाज' के सह-संस्थापकों  में से थे | 1911 में वेंकटजी जुडिशियल मैजिस्ट्रेट की  नौकरी छोड़ कर ब्रह्मों  मिशन से जुड़े थे ||

  संस्कारित परिवार का बेटा धर्म अपने बहरमपुर के घर पर बचपन से ही महात्मा गाँधी,सुभाष चन्द्र बोस ,जयप्रकाश नारायण, नेहरु सरीखे नेताओं का आना-जाना देखता रहा था | 1940 में पिता की   मृत्यु तक | कांग्रेस के प्रतापी दक्षिण भारतीय नेता कृष्ण मेनन की मदद से मैसूर विश्विद्यलय का प्रतिभाशाली छात्र धर्म तेजा ब्रिटेन गया और पत्नी लॉरा के साथ  कुछ  ही समय में धन-कुबेर बन बैठा | फिर देश की याद आयी तो भारत लौटा और 1961 में जयंती शिपिंग कारपोरेशन की लौन्चिंग की | दूसरी देशी पत्नी  रंजीत कौर के साथ पंडित  नेहरु से मिलकर योजना के बारे में बताया | पंडित जी ने शिपिंग डेवलपमेंट फण्ड से 20 करोड़ की राशी बतौर कर्ज दिलवा दी | फिर  तो जापान की मित्सिबुत्सी हैवी इंडसट्रिज से अंतर्राष्ट्रीय शिप यार्ड का समझौता कर छब्बीस जहाजों का बेडा  और आर्थिक तिकड़म का लम्बा खेल खेलता रहा | पंडित नेहरु की मौत के  बाद इंद्रा गाँधी के संपर्क में आया लेकिन अगस्त  1966  में  इन्द्राजी ने तेजा के  खिलाफ सी.बी.आई को जांच सोंपी तब जाकर धर्म तेजा फंदे में फंसा और हमलोगों से भेंट हुयी |यहाँ यह स्मरण करना अप्रासंगिक न होगा कि डॉ लोहिया ने लोकसभा में 'मिंक कोट' भेंट में देने का आरोप इंद्रा जी पर लगाया था |वह भेंट देने वाला और कोई नहीं धर्म तेजा ही था | ये कहानी इंटरपोल से होती हुयी मोरारजी के प्रधानमंत्री बनने से भी आगे तक जाती है | 

      हम लोग यानि मोहन प्रकाश (वर्तमान में कांग्रेस के एक राष्ट्रिय महासचिव),समाजवादी पूर्व मंत्री शतरुद्र  प्रकाश ,रुपांतरित  कांग्रेसी राधेश्याम सिंह, वर्रिष्ठ-गरिष्ठ पत्रकार योंगेन्द्र नारायण शर्मा और नाचीज़ ,दुसरे ही दिन हमलोग धर्म तेजा के जेल से तफरी के लिए निकलते समय यथा स्थान पर पहुँच  गए | तेज खोपड़ी धर्म तेजा दूर से नौजवानों को अपनी ओर बढ़ते देख ठिठका और हम थे की अपनी बनारसी औकात पर आ गए -'मार सारे के . ....' (मारो साले को) ललकारते हुए दौड़ पड़े | अकाली साथी पिच्छे थे ही | ऐसे में 'पगली घंटी' बजनी ही थी | पल भर में बवाल मच गया | जेल से छूटते तक जेल प्रशासन की हमपर चौकस निगरानी अंत तक बनी रही लेकिन धर्म तेजा की तफरी भी  अंततः रुक गयी थी |

 (असमाप्य)