आखिर धर्म, जाति, समाज की सोच कहां से आई ?

                                                       

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

सृष्टि का रचनाकर्ता मनुष्य का जन्मदाता है, पर मनुष्य-धर्म, जाति, समाज का जन्मदाता है? 

धर्म, जाति, समाज मुक्त मानवीय जीवन की ओर कदम बढ़ाना स्वर्णिम भारत, आत्मनिर्भर भारत की शान में मील का पत्थर साबित होगा- एड किशन भावनानी 

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर बीते कुछ वर्षों से हम मीडिया के माध्यम से देख व सुन रहे हैं कि धर्म, जाति, समाज, रंगभेद की घटनाओं में वर्ष दर वर्ष इजाफा होते जा रहा है कोई अवसर मिलते ही उसे झट से लपक कर अपने-अपने सामूहिक हितार्थ उस उपरोक्त श्रेणियों के वर्ग में ले लिया जाता है और फिर दंगों का सिलसिला जारी हो जाता है यह सिलसिला हम अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि अनेकयूरोपीय देशों से लेकर हमारे एशिया तक जारी हैं। 

हालांकि यह सदियों से है परंतु वर्तमान कुछ वर्षों से यह क्रम बढ़ते ही जा रहा है इसलिए ही किसी ने सच कहा है कि सृष्टि का रचनाकर्ता मनुष्य का जन्मदाता है पर मनुष्य ही धर्म जाति समाज का जन्मदाता है!! आखिर धर्म जाति समाज की सोच कहां से आई? जिसके बल पर मनुष्य इनमें विभाजित हो चुका है खासकर कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि दो धर्म समुदायों में अधिक तकरार देखने को मिल रहा है जिसका असर वैश्विक स्तर पर पड़ रहा है। 

साथियों बात अगर हम भारत की करें तो भारत शुरू से ही धर्मनिरपेक्ष मानसिकता का पक्षधर रहा है और शांतिप्रियता भारत के खून में ही समाई है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई आपस में ही हैं सब भाई भाई। परंतु बीते कुछ वर्षों में दो समुदायों में धार्मिक उन्माद का क्रम बढ़ते जा रहा है बीते कुछ महीने पहले हिजाब का मामला, तीन तलाक का मामला,बुलडोजर मामला, अस्सी बीस का मामला, ज्ञानवापी का मामला, लाउडस्पीकर मामला, अन्य स्थानों पर नमाज़ का मामला और अभी कुछ दिन पहले एक समुदाय विशेष के पैगंबर के संबंध में एक प्रवक्ता की टिप्पणी से 10 जून से आज तक दंगों की चपेट में भारत के  यूपी, झारखंड, पश्चिम बंगाल सहित कुछ राज्य झुलस रहे हैं उनपर एफआईआर तीनसव पार आरोपी गिरफ्तार,विभिन्न पार्टियों के नेताओं की उन्मादीबयानबाजी आए दिनों हम टीवी चैनलों पर देख रहे हैं जो हमारे विज़न स्वर्ण भारत नया भारत, आत्मनिर्भर भारत के शुभ संकेत नहीं माने जा सकते। 

साथियों बात अगर हम दिनांक 14 जून 2022 को सीजेआई को पत्र लिखने की करें तो, कई रिटायर्ड जजों और वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर यूपी में बुलडोजर कार्रवाई और गिरफ्तारियों पर संज्ञान लेने की मांग की है।

 6 रिटायर्ड जजों समेत 12 लोगों ने पैगंबर मोहम्मद विवाद के संदर्भ में पत्र में लिखा कि हाल में यूपी के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके बाद बड़े पैमाने पर लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया। कई लोगों के घरों को बुलडोजर से तोड़ दिया गया। ये कार्रवाई गैरकानूनी है। नियमों के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट को इस पर संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसी रिपोर्ट मीडिया में आई है। 

साथियों बात अगर हम मूल विषय इस धर्म, जाति, समाज की करें तो यह मनुष्य के मस्तिष्क की ही देन है क्योंकि सृष्टि रचनाकर्ता ने तो खूबसूरत मनुष्य की रचना कर उसमें अनमोल बुद्धि रूपी सौगात बक्शी थी!! परंतु अब प्रश्न है कि आखिर धर्म जाति समाज की सोच कहां से आई ?

 इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार धर्म के उत्पत्ति का मुख्य कारण मनुष्य का सत्य को जानने की प्रवृत्ति के कारण हुआ और चूंकि सत्य को समझने की मानववृत्ति एक जन्मजात वृत्ति है, इसलिए यह जानने का कोई कारण दिखाई नहीं देता कि उसका प्रारंभ मानव इतिहास में काफी समय बाद हुआ। आदिम काल में मनुष्य ने प्रकृति के कार्यो को समझने का प्रयास किया होगा। यदि आज विज्ञान का युग है तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि विज्ञान आदिम काल में रहा नहीं होगा। बिना बीज के वृक्ष कैसे उत्पन्न हो सकता है? 

पुरातन युग में भी कोई दार्शनिक या वैज्ञानिक रहे होंगे ही जिन्होनें प्रकृति के विभिन्न कार्य-कलापों को समझने का प्रयास किया होगा। सही बात तो यह है कि धर्म मानव जीवन की सहजवृत्ति है। धर्म की उत्पत्ति के किए हमें मानव प्रकृति को ही आधार मानना होगा, क्योंकि परिवर्तन होने के बाद भी मानव प्रकृति में एक अविच्छिन्नता की जाती है। 

जिस तरह आज का मानव सुख-दुख का अनुभव करता है, क्रोध और द्वेष का शिकार है, भूख और प्यास को अनुभव करता है, उसी तरह आदिमानव भी करता था।साथियों बात अगर हम इतिहास के दृष्टिकोण से धर्म जाति समाज उत्पत्ति की बात करें तो, इसी प्रकार ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इस बात का पता लगाया जाता है कि धर्म का प्रादुर्भाव कब और किन-किन रुपों में हुआ था तथा इसके विकास की क्या गतिविधि रही ? 

इसमें संदेह नही कि धर्म की उत्पत्ति एवं विकास का वैज्ञानिक अध्ययन आधुनिक विज्ञानों जैसे- मानवशास्त्र , मनोविज्ञान तथा ऐतिहासिक पर्यप्रेक्षण द्वारा सम्भव हुआ और इन अध्ययनों के आधार पर ही कुछ सिध्दांतो का प्रतिपादन भी हुआ, परन्तु इन सिध्दांतों के पहले भी कुछ सिध्दांत प्रचलित थे जो कि अब इतने प्रचलित नही है । इन प्राचीन सिध्दांतो से भी धर्म की उत्पत्ति पर पर्याप्त मात्रा में प्रकाश डाला गया था। सर्वप्रथम इन प्राचीन सिध्दांतो पर ही विचार कर लेना ठीक होगा। 

साथियों बात अगर हम जाति की उत्पत्ति संबंधी मीडिया में दी गई जानकारी की माने तो, जहां तक कि जाति की उत्पत्ति के संबंध में माना जाता है,ऋग्वेद के अनुसार, धर्म के सिद्धान्त की व्याख्या की जाती है जोकि हिन्दूओं के सबसे पवित्र ग्रन्थों में से एक है के अनुसार, विभिन्न प्रकार के वर्णों का निर्माण प्रारम्भिक पुरुष (सबसे पहला व्यक्ति) के विभिन्न अंगों से हुआ है, ब्राह्मण का निर्माण उसके मस्तिष्क से हुआ, क्षत्रिय का निर्माण उसके हाथों से हुआ, वैश्य का निर्माण उसकी जांघों से हुआ और शुद्र का निर्माण उसके पैरों से हुआ। 

मनोवैज्ञानिक विवेचना द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि मानव मन में धर्म की उत्पत्ति कैसे और किन-किन कारणों से हुई ? मानव में सर्वप्रथम किन प्रवृत्तियों इच्छाओं संवेगो तथा प्रेरणाओं के कारण धर्म की भावना जागी जिसके कारण मनुष्य धर्म की ओर उन्मुख हुआ। 

साथियों बात अगर हम मान्यताओं पर विश्वास की करें तो हिंदू धर्म, जैन धर्म, यहूदी धर्म, पारसी धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म इसके अलावा भी अनेक धर्म, दुनिया में शिंतो, ताओ, जेन, यजीदी, पेगन, वूडू, बहाई धर्म, अहमदिया, कन्फ्यूशियस, काओ दाई आदि अनेक धर्म हैं लेकिन ये सभी उपरोक्त धर्मों से निकले ही धर्म हैं 

साथियों बात अगर हम निष्कर्ष पर पहुंचने की करें तो ये बहुत निंदा की बात है कि, अब 21वीं शताब्दी में भी और इस आयु और समय में जबकि मानव समाज ने वैज्ञानिक तौर पर इतनी तरक्की की है कि लोग मंगल ग्रह पर भी जमीन खरीदने की योजना बना रहे हैं, भारतीय समाज तब भी जाति धर्म समाज दंगों हेट स्पीच प्रथा जैसी प्राचीन व्यवस्था में विश्वास रखता है। 

अब समय आ गया है कि माननीय जीव को हेट स्पीच और सोच को बदलने की शुरुआत सबसे पहले स्वयं से कर उसके बाद समाज मोहल्ले शहर जिले राज्य से होते हुए राष्ट्रीय स्तरपर बदलाव की सौगात राष्ट्र को दें, ताकि भारत फिर सोने की चिड़िया और स्वर्णिम भारत होने का दर्जा प्राप्त कर सके।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण  का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आखिर धर्म जाति समाज की सोच कहां से आई? सृष्टि का रचनाकर्ता मनुष्य का जन्मदाता है पर मनुष्य धर्म जाति समाज का जन्मदाता है!! धर्म, जाति, समाज मुक्त मानवीय जीवन की ओर कदम बढ़ाना स्वर्ण भारत आत्मनिर्भर भारत की शान में मील का पत्थर साबित होगा। 

-संकलनकर्ता लेखक - कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र