"पिता की शख़्सियत को कोई शब्दों में कैसे ढ़ालें"

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

शब्द ज़रिया है एहसासों को दर्शाने का पर कभी-कभी चंद शब्द पर्याप्त नहीं होते कुछ भावनाओं को पूर्णतः दर्शाने के लिए। किसी भी बच्चे की औकात ही नहीं पिता की शख़्सियत को शब्दों में ढ़ालने की। माँ धुरी है पर पिता नींव है जिसके काँधे पर इमारत खड़ी है पूरे परिवार की। महसूस किया है कभी पिता के गीले गिलाफ़ को किसीने ? 

ना...आँखों की नमी को पीने का हुनर बखूबी जानते है पिता, सबको सांत्वना देता हुआ वो इंसान खुद भीतर से मलबा होता है अपने शौक़ के कतरों को दफ़न करके ज़िंदगी की बिसात से सबके लिए खुशियों के गौहर चुनता है। बेटे के लिए सागर है पिता अपना भविष्य बेटे की आँखों में देखते है। बेटे को हर सुविधा से नवाजते पाई-पाई खर्च कर देते है, तो बेटी के लिए पूरा आसमान है पिता, बेटी के दामन में अपनी औकात से एक कदम आगे बढ़कर जीवन की सारी खुशियाँ भर देते है।

सैंकड़ों गाथाएँ कही गई माँ की पीड़ा पर, पर उस पिता की झुकी रीढ़ की कर्म कहानी न गायी गई कहीं पर, संसार रथ का सारथी आखों से दर्द की किरकिरी झरें, वहन कर रहा परिवार का हंसी में सबकी रंग भरे। वृक्ष की भाँति छाँह देता सीना तानें पाँव बढ़ाता अग्नि पथ पर चले मर्दाना, रुके नहीं थमे नहीं चाहे कितनी आहें भरे।

कंटको के शर पर चलकर बागबान बन यत्न करें, अपने सपने जला जलाकर उम्र की यात्रा ख़त्म करें। चौड़ा सीना, चुस्त निगाहें व्यर्थ न नैंना अश्रु भरे, तम घिरा चाहे ग़म घिरा हो जूझता जीवन ज़ोम भरे। लहरों से लड़ता कष्टों को सहता चढ़कर गिरकर फिर से संभलता, कोशिश करता उत्साह दुगना तन-मन में भरे। अकुशल होता नहीं जताता संबल बनकर सिंचता जाता, परिवार के सुख से अपने उर उमंग जो भरे। 

कंधों पर असबाब उठाता ऋण कहाँ कोई उसका चुकाता, बचपन से पचपन के युद्ध  में योद्धा बनकर उभरे। त्याग की मूरत ईश सी सूरत पिता बच्चों की पहचान है  पसीजता खुद संघर्षों से महक परिवार उपवन में भरे। जीवन खेत पर तन को जोत कर तिनका तिनका जोड़े, पिता टूटकर विहंग की ख़ातिर नीड़ बुनकर सुख सारे भरे।

एक पिता कि ज़िंदगी का सफ़र आसान नहीं किशोरावस्था से ही खुद को तराशता है ज़िन्दगी के हर एक संघर्ष और चुनौतियों का सामना करने के लिए। परिवार को अपनी परवाज़ में समेटे हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाते ज़िन्दगी की चुनौतियों को सीने पर जेलते अपना कर्तव्य निभाए जाते है।

दिल में खुद के जीवन से जुड़ी हर औरत का पूरा सन्मान लिये, उसे पूरी इमानदारी से हिम्मत और आत्मविश्वास से रक्षता है। पत्नी और बेटी को विश्वास दिलाता है उसके होते कोई परेशानी छू न पाएँगी तुम्हें। पिता जो समझता है की औरत भी इंसान है वो दिलाता है अहसास पत्नी की हथेलियों को अपने मजबूत हाथ में लेकर की हाँ में तुम्हारा दोस्त हूँ, हमदर्द हूँ , हमनवाज़ हूँ और बच्चों के राहबर बनकर हर मोड़ पर अपना साथ देते खड़े होते है पिता।

एक ही बिस्तर पर पास-पास सो रहे दो शरीरों के साँसों की आवाज़ तक सुनाई देती है, पर ज़िंदगी की उलझनों से घिरे पुरुष के भीतरी धमासान का शोर भूले से भी नहीं जताता अपनी अर्धांगिनी को, मैंने कभी किसी पुरुष का तकिया गीला नहीं देखा। पूरे परिवार की अस्क्यामत को खुद के कँधों पर लादे देते है एक सुख संपन्न भरा जीवन सबको।

 एक पिता ही पूरी सृष्टि में सहनशीलता का प्रतिक है, जो कभी संघर्ष से ड़गमगाता है तब अपने पर्याय सी स्त्री के कँधे पर सर रखकर अश्कों की नमी को पीते जताता भी है की हाँ मैं अधूरा हूँ तुम बिन, सलाम है ऐसे धैर्यवान, हिम्मतवान, शौर्यवान पिता के जज़बे को।

पुरुष के वात्सल्य का झरना एक बार ही आँखों में सैलाब लाता है, बेटी को ससुराल विदा करते वक्त, आस-पास की भीड़ को भूलकर फूट-फूट कर रोने में उसे कोई शर्म नहीं, तभी तो हर बेटी का हीरो उसके पापा होते है। कहा जाता है की स्त्री गहन है उसे चाहते रहो समझने की जरुरत नहीं, मैं हर स्त्री को कहूँगी पुरुष को सिर्फ़ समझो वो भावुक बच्चे सा है तुम्हें खुद ब खुद चाहने लगेगा॥

भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर