पेंशनर्स- (मप्रछग के)

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

यहां भी तुम्हारा है वहां भी तुम्हारा है,

यहां का साहिबे मसनद जनता का दुलारा हैं

पेंशनर्स तो बेचारा किस्मत का मारा हैं,

मिलती है रुसवाई मांगते जब, राहतें महंगाई,

ना बनती सहमति बिगड़तें काम है देखो,

लगा के आस फिर भी देखो ये साथ बैठे हैं,

शर्म इनको है मगर आती नहीं इनको,

राहत इनके पापी पेट को मिल जाये तो

संभव हो समझों तब ही चैन से इनका गुजारा हैं !

जिम्मेदारी बांटके महंगाई राहत की देखली फिरभी,

अधर में पेंशनर्स लटके, बाकी काम क्या इनका,

बाकी काम तुम्हारा हैं!

मिटा क्यों नहीं देते,

हटा क्यों नहीं देते,

सहमति की लकीरों को,

जिसने पेंशनरों के दिल से

तुम्हारा नाम उतारा हैं,

शर्म हैं उनको भी मगर

रखते नहीं देखो, इसी

टाल्लमटोली ने इन्हें तो

चक्करघिन्नी बना डाला हैं !

- मदन वर्मा " माणिक " इंदौर