सावन के रसधार

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

रिमझिम- रिमझिम पड़े 

फुहारें, सावन के रसधार में।

हंसती जगती नाचे मनवा, 

आई मस्त बहार में।

झूले राधे श्याम  साॅंवरे, 

सावन के दिन चार हैं।

मोहन की मुरली पुकारती, 

मेघों के मल्हार में।

बढ़ता जाता नीर नयन से,

दुखदायी संसार है।

उर में है आनंद समाया, 

हर्षित है मन प्यार में।

रास रचाते मोहन बृज में,

कल-कल यमुना धार है।

पीतांबर धोती है तन पर,  

कुंदन मोती हार में।

नाम तिहारा मनको भाये, 

गिरधर  हैं सुखधाम ये।

अंतरमन को तान सुनादो, 

डूबे हैं मझधार में।

सुनीता सिंह सरोवर