अनुराग दर्शन

 

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


प्राण का यूं अन्यत्र खो जाना 

जैसे ब्रह्म का दर्शन पाना।


दिव्य दीप का नित जल जाना 

आंसू से फिर उसे बुझाना। 


जैसे पाकर खुद को खोना 

सुधियो का विस्मित हो जाना। 


अचरज नहीं यही माया है 

अनुराग की अव्यक्त छाया है।।


अंजनी द्विवेदी (काव्या)

देवरिया उत्तर प्रदेश