कौन सा हिंदू और कौन सा हिन्दुत्व..?

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क   

(पवन सिंह)

धर्म और जातीय श्रेष्ठता एक विष है। जब यह दिमाग में प्रवेश कर जाता है तो इंसान नफरती और वहशी हो जाता है। वह दिखता जरूर एक इंसान की तरह है लेकिन दरअसल वह भीतर से जानवर हो चुका होता है। धर्म व जातियों के जहर ने पूरे विश्व में अपने निशान छोड़ रखे हैं और नये निशान बना रहे हैं। जिन्हें ये‌ निशान देखने हैं वो मिडिल ईस्ट से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ताज़ा-ताजा श्री लंका में देख सकते हैं। भारत में आरंभ हो चुका है यहां भी धर्म की सब्जी में जाति का, आलू मिक्स हो चुका है और उसके नीचे फर्जी राष्ट्रवाद की आग जलाई जा चुकी है। इंसान होकर अगर देखें और जर्मनी के इतिहास की ओर नजर दौड़ाएं तो आपको बहुत सारी समानताएं नजर आएंगी। हिटलर ने लोगों के दिमाग में नात्सी विचारधारा को आसमान जैसा ऊंचा किया और  यहूदियों को विश्व की सबसे निम्न स्तरीय नस्ल बना दिया। उसने यह परिभाषित कर दिया कि जर्मनी में जितनी‌ भी  समस्याएं हैं  उनका मूल कारण यहूदी ही हैं। यहूदियों से आम जर्मनी नागरिक बुरी तरह से घृणा करने लगे। इस नफरत पर फर्जी राष्ट्रवाद का खोल चढ़ा दिया गया। यहूदी लोग जर्मन समाज से बिलकुल अलग बस्तियों में रहते थे जिन्हें घेटो' कहा जाता था। नफरत बढ़ती गई और हिटलर ने लाखों यहुदियों को गैस चेंबर में डाल कर मार डाला। हिटलर ने 6 साल में  60 लाख यहुदियों को मार डाला था। 1933 में जर्मनी की सत्ता पर काबिज हुए एडोल्फ हिटलर ने एक नस्लवादी साम्राज्य स्थापित किया था। हिटलर के लिए यहूदी इंसानी नस्ल का हिस्सा ही नहीं थे। यहूदियों के लिए हिटलर की ये नफरत होलोकास्ट के रूप में सामने आई। यहूदियों को खत्म करने का सिलसिला मई, 1933 से पोलैंड में खुले ऑशविच कन्सनट्रेशन कैंप से शुरू हुआ था। पोलैंड के इस कैंप में धर्म, नस्ल, विचारधारा या शारीरिक कमजोरी के नाम पर लाखों लोगों को गैस चैंबर में भेज दिया जाता था। बूढ़े और बीमारों को गैस चैंबर में मौत दी जाती थी। कैंप में चार क्रिमेटोरियम थे, जो हर दिन 4,700 लाशों को जला सकते थे। होलोकास्ट इतिहास का वो नरसंहार था, जिसमें छह साल में करीब 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई थी। इनमें 15 लाख केवल बच्चे थे।  27 जनवरी 1945 को सोवियत रेड आर्मी द्वारा हिटलर को परास्त किए जाने तक कूवल ऑशविच कैंप में ही 11 लाख लोगों की मौत हो चुकी थी।

हिटलर का मानना था कि जीज़स क्राइस्ट' को यहूदी समुदाय के लोगों ने ही सूली पर लटकाया था। वैसे मैं बता दूं किअल्बर्ट आइंस्टीन भी यहूदी थे क्योंकि योग्यता किसी जाति व धर्म की बपौती नहीं होती है।

एक 89 साल पुरानी घटना का भी जिक्र कर रहा हूं। नासिक में प्रसिद्ध कालाराम मंदिर है। यहां एक रथ था जिसे  डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा धक्का लगाया जाना था। यह स्वघोषित बड़ी जाति के हिन्दुओं के लिए असहज था। अंबेडकर का हाथ रथ में न लग जाए इसके लिए रथ ही गायब कर दिया गया।आंबेडकर जी ने इस मसले पर लड़ने की ठानी। 2 मार्च, 1930 को यह लड़ाई शुरू हुई और पांच सालों तक चली। गोदावरी नदी के किनारे बसा नासिक सनातनी हिंदुओं का गढ़  था। नासिक में ही कालाराम मंदिर है जहां हज़ारों 'अछूतों' के साथ बाबा साहेब द्वारा के प्रवेश का इरादा था। डॉ. आंबेडकर की जीवनी लिखने वाले धनंजय कीर लिखते हैं, "आंबेडकर ने महाराष्ट्र के ब्राह्मणों को साहस के साथ चुनौती दी थी।''उस समय अंग्रेज़ों का भारत पर राज था. कांग्रेस अंग्रेज़ों से लड़ रही थी और दूसरी तरफ़ आंबेडकर हिन्दू धर्म के भीतर दलितों से भेदभाव और शोषण के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। आंबेडकर जी  हिन्दू धर्म में सवर्णों के विशेषाधिकार को चुनौती दे रहे थे। 2 मार्च 1930 को नासिक शहर मे एक जुलूस निकला था।

आंबेडकर की अध्यक्षता में एक जुलूस निकालने का निर्णय लिया गया जिसमें लगभग15 हज़ार लोग शामिल थे। धनंजय कीर लिखते हैं कि श्रीराम का नारा लगाते हुए यह जुलूस निकला औल मंदिर के पास पहुंचा। मंदिर के सारे दरवाज़े बंद कर दिए गये। जुलूस लौटकर गोदावरी नदी के किनारे आया और यहा़ भव्य सभा हुई। दूसरे दिन मंदिर में प्रवेश करने का निर्णय लिया गया और आंदोलनरत पहली टुकड़ी में 125 पुरुष और 25 औरतें शामिल की गईं लेकिन मंदिर में प्रवेश न हो सका। पूरा महीना यह आंदोलन चलता रहा। 9 अप्रैल, 1930 को रामनवमी के दिन सनातनी हिंदुओं और आंबेडकर के नेतृत्व वाले आंदोलनकारियों में एक समझौता हुआ कि राम का रथ खींचने में अब अछूत भी शामिल होंगे। अपने कार्यकर्ताओं के साथ आंबेडकर मंदिर के पास आए लेकिन आंबेडकर और उनके समर्थकों के हाथ लगाने से पहले ही सनातनी हिन्दू रथ लेकल निकल गये। आंबेडकर ने इस घटना पर एक खत मुंबई प्रांत के ब्रिटिश गवर्नर फ्रेडरिक साइक्सको को लिखा। अंबेडकर के अनुयायियों पर पत्थरबाजी हुई। आंबेडकर पर कोई पत्थर ना गिरे इसलिए उनके सिर पर लोगों ने छतरी लगा रखी थी। इस घटना में एक युवक की मौत हो गई और बहुत से लोग घायल हुए। बाबासाहेब आंबेडकर की जीवनी लिखने वाले धनंनजय कीर लिखते हैं कि, ''सत्याग्रह के बाद नासिक में 'अछूतों' को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनके बच्चों के स्कूल बंद हो गए। आने-जाने के रास्ते बंद कर दिए गए। दुकानों से उन्हें सामान मिलने बंद हो गए। आंदोलन के दौरान ही आंबेडकर को गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाना पड़ा और आन्दोलन की जिम्मेदारी भाऊराव गायकवाड़ ने उठा ली। यह संघर्ष 5 साल चला लेकिन 'अछूतों' को मंदिर में प्रवेश नहीं मिला। भारत को आज़ादी मिलने के बाद इस मंदिर में अछूतों को प्रवेश मिला।

धर्म का पागलपन अरब देशों व इजराइल के बीच  भी नजर आ जाएगा। इसे आप  अरब-इजराइल संघर्ष कह सकते हैं।  इस संघर्ष का मूल कारण १९वीं शताब्दी के अन्त में यहूदीवाद तथा अरब राष्ट्रवाद का उदय होना है। 

मेरे घर के पास एक आश्रम है। देखकर लगता है अभी नई धर्म की दुकान खुली है ज्यादा चलायमान नहीं है। यहां रोज सुबह-शाम भोंपू लगाकर आरती होती है..एक गुरू माता भी हैं....रोज एक नारा लगता है-प्राणियों में सद्भावना हो, अधर्म का नाश हो,  ऊं शान्ति..ऊं शांति... सद्बुद्धि की भी मांग होती है लेकिन ये भारी भरकम प्रार्थना के भारी नारे बस लगाने भर के हैं, इससे ज्यादा कोई अहमियत नहीं रखते। यंत्र नारियस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:, वसुधैव कुटुंबकम्...धंधा नफरत का और बातें हिमालय जैसी...!! दरअसल, धर्म व जाति श्रेष्ठता का यही असल चेहरा ...वैसे भी कहा जाता है जिसे देखना हो कई बार देखना हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी। एक साहेब पिछले दिनों मुझसे बोले-आप राम को मानते हैं? मैंने कहा हां...कबीर के राम को..जो आप‌में हैं, मेरे में हैं, अल्ताफ हुसैन के भीतर‌ हैं, डिसूजा के भीतर‌ हैं, रैदास के भीतर हैं, रामदीन के भीतर‌ हैं, हर एक तिवारी, मिश्रा, द्विवेदी, दुबे, चौबे के भीतर हैं, प्रताप और अग्रवाल, गुप्ता के भीतर हैं...!!..बस मेरे राम मंदिरों में ‌नहीं पाए जाते... तलवार और लाउडस्पीकर में नहीं पाए जाते। उनका फिर सवाल आया-आप हिन्दू हैं न? मैंने का न...मैं इंसान हूं..वैसे कौन सा हिन्दू और कौन सा हिन्दुत्व? ग्रेड वन वाला हिंदू या ग्रेड-टू वाला हिंदू या ग्रेड थ्री वाला हिन्दू....!!!...उनकी समझ में नहीं आया तो वो चले आते और उसके बाद यह लेख लिखने का विषय दे गये। मेरे जेहन में गुरू गोलवलकर का वह कथन गूंज रहा है जब गुरुजी कहते हैं-मुझे जीवन भर अंग्रेजों की गुलामी करना स्वीकार है लेकिन यह कदापि स्वीकार नहीं है कि दलित, मुस्लिम और ओबीसी को शिक्षा का अधिकार मिले। ...तो ये क्या हिंदू नहीं हैं..????