यादें

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

ज्योति आज बड़ी खुश थी, अविनाश की पदोन्नति के बाद नए शहर कानपुर में नए घर मे आ गयी थी । पहले तो कुछ दिन सब कुछ व्यवस्थित करने में बीत गए। उसके बाद उसने भी अपनी डिग्री और समय का उपयोग करना चाहा।  बहुत जल्दी उसे एक अच्छे इंगलिश मीडियम स्कूल में टीचर की जॉब मिल गयी ।

अब रोज समय दिन दूनी रात चौगुनी गति से बीत रहा था, इसी बीच नया सेशन शुरू हुआ, और उसे क्लास छठवीं में  क्लास टीचर बनकर जाना पड़ा । 

छात्रों की उपस्थिति के बाद अटेंडेंस लेना शुरू किया, बीच मे एक नाम मे उसका दिमाग अटक गया। बाहरी तौर पर सब कुछ कर रही थी, पर दिल मे द्वंद चल रहा था। घर पहुँचते तक अतीत के समुद्र में तैरती रही, कुछ यादे थी, जो सुनामी की लहरो की तरह तूफान मचा रही थी।

बचपन और स्कूल के दिन याद आ गए, एक प्यारी सी हस्ती प्रकाश , जिसके साथ बचपन के हर खेल लूडो, कैरम, व्यापार में भागीदार बनती रही, स्कूल में भी एक कक्षा में रहने के कारण हर पल साथ रहते, चाहे लड़ते झगड़ते ही क्यों न हो, पर जुदा नही होते थे । जैसे जैसे  दोनो बड़े हुए,  दोस्ती प्यार में बदल गयी, और एक दूसरे में खो गए, कई सपने देखे जैसे अक्सर इस उम्र में लोग उड़ते हैं, एक प्यारा सा घर होगा, दो बच्चे होंगे, और हमारा प्यार होगा ।

पर ईश्वर भी हर हाथ रेखाएं कुछ अलग ही बनाता है, उसी के अनुसार दसवी के बाद प्रकाश और उसका परिवार दूसरे शहर में चले गए, कुछ दिन अनमनी रही, फिर दुनिया के साथ उसका जीवन भी गतिशील रहा, और आज फिर बहुत कुछ याद आ गया । 

दूसरे दिन स्कूल में उस प्यारे से बच्चे को अपने पास बुलाया, उससे उसका पूरा पारिवारिक विवरण लिया, यहां बहुत बड़े सरकारी अफसर के पद में उसके पापा प्रकाश ही थे ।  फिर घर पहुँचने पर ,यादे थी और ज्योति, .बस , 

दो दशक के बाद फिर से, दिल में कहीं कोने में धुंधली सी एक तस्वीर थी, आज के वाकया के कारण उस तस्वीर को यादो से घिस घिस कर चमका दिया । 

पैरेंट टीचर मीटिंग के दिन वो धड़कते दिल से सारे पेरेंट्स से बच्चों की पढ़ाई की बाते कर रही थी, उस दिन जानबूझ कर हल्की ठंड होने के कारण धूप में काला चश्मा पहन कर बैठी थी । तभी एक चमकता प्रकाश बिखरा और एक पति पत्नी जो अपने बेटे का हाथ पकड़ कर पास आ गए, उनसे औपचारिक बाते करती रही, और वो दिन समाप्त हुआ, प्रकाश अपनी ज्योति को नही पहचान पाया।

उसी रात को जैसे ही समय मिला फेसबुक खोला, चलो इसी में ध्यान बंटाया जाए। सबसे पहले एक फ्रेंड रिक्वेस्ट प्रकाश वर्मा की देखी, देखकर अचकचा गयी, हे भगवान, इसका मतलब पहचान लिया, अब उसे समझ मे नही आ रहा था, खुश होए या दुखी होए। सबसे पहले एक गाना जो वो हमेशा से गुनगुनाती थी याद आ गया....इक मन था मेरे पास जो अब खोने लगा है, पाकर तुझे जैसे मुझे कुछ होने लगा है।

सोच ही रही थी, फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करूँ या नही, तब तक उंगलियों ने दिल की सुनी, दिमाग को पीछे धकेल दिया। फिर ध्यान गया, मैसेंजर पर कुछ लिखा है, और

एक सांस में हर शब्द को जेहन में बसाती रही......."ज्योति, तुम जितने भी कवच पहन लो, मैं तुम्हे पहचान लूंगा, तुम्हे याद है, मैने कहा था, मैं कहीं भी किसी के साथ भी रहूं, पर जीवन मे जब भी एकांत मिलेगा, तुम मेरी परछाई बनकर मेरे साथ रहोगी । शायद हर मनुष्य के दिल का एक व्यक्तिगत कोना ऐसा जरूर होता है, जिसको वो अगर न चाहे तो जीवनभर किसी को बिना दिखाए रह सकता है, हमने तय किया था, बेटे का नाम पुण्य प्रकाश रखेंगे, और मैंने वो कर दिखाया, समय अपने रंग जीवन मे बिखेरता ही है, खुश रहो जहां रहो।"

"हां, प्रकाश, एक लंबे अंतराल के बाद देखना, अच्छा लगा, पर उम्मीद करती हूं, कि जीवन के कर्तव्यों को और मेरी मजबूरी को समझोगे।"

आंखे बरसने की तैयारी ही कर रही थी कि अविनाश की आवाज़ आयी, अब आ भी जाओ, बंद करो सब, और लाइट ऑफ हो गई।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर