बटकी म बासी अउ चुटकी म नून

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

जब जब हम गाते है "बटकी म बासी अउ चुटकी म नून" तो मन में अलग ही ठंडकता महसूस होती है, छत्तीसगढ़ के ददरिया लोक गीतों में भी अपने खान पान का झलक मिलता है, हर छत्तीसगढ़िया का पहला पसंद बोरे बासी और गर्मी के दिनों में बोरे बासी खाने का मज्ज़ा ही कुछ और है। छत्तीसगढ़ में प्रचलित कहावत है ठण्डा मतलब बोरे बासी, बासी शरीर को ठंडक प्रदान करती  ही है और वैज्ञानिकों ने शोध किया है की छत्तीसगढ़ की बासी में जरूरक पोषक तत्व पोटैशियम, कैल्शियम मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध होता है, बासी खाने से गर्मी में लू नहीं लगती, पाचन क्रिया संतुलित रहता और रक्त चाप भी नियंत्रित रहता है। अब शायद आपको मालुम चला होगा यूं ही नहीं खाते थे छत्तीसगढ़ के लोग उनके ये आहार खाने का कुछ कारण था, पर कईयों को लगता होगा की यह अनपढ़ो का आहार है पर आज नाशा (NASA) भी यह पुष्टि करता है की छत्तीसगढ़ की बासी में दम है, बासी के साथ छत्तीसगढ़ की छत्तीस प्रकार के भाजी आज देश विदेश के अखबारों में चर्चित है। 

बोरे बासी मतलब रात का बचा हुआ चावल को गर्मी के दिनों में पानी डालकर रखने और सुबह खाने को बोरे बासी कहा है, बासी के साथ लाई बरी, दही, बिजौरी, दही भोरे मिर्चा, प्याज़, चेच भाजी के साथ खाने का आनंद अलग ही आता है। 

छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नधृष्ठा डॉ. खूबचंद बघेल लिखते है, 

गजब बिटामिन भरे हुए हे, 

छत्तीसगढ़ के बासी मे....   

अंतिम बासी को साधा

निज यौवन पूरण मासी मे

गौतम बुद्ध कबीर मिले

मुझे छत्तीसगढ़ के बासी मे। 

बासी के गुण कहौं कहां तक

येला न टालौ हासी मे 

गजब बिटामिन भरे हुए हे

छत्तीसगढ़ के बासी मे।

पदम् श्री श्यामलाल चतुर्वेदी जी लिखते है 

पेज समुंद मा बासी बिस्नु, बूड़े बिहनहे ले देखा।

पंचामृत कस पीबों खा परसाद बरोबर अनलेखा।

बासी खाके ओ फल पावा, जउन अजोध्या कांसी मा। 

जबड़ पुसटई भरे हे भाई  छत्तीसगढ़ के बासी मा।

 वे बासी का पानी को समुन्दर और बासी को भगवान विष्णु मानते है, उन्हें प्रातः उनकी दर्शन करना अच्छा लगता है कहते है जो आनंद बासी को पंचामृत मान खाने में है वो आंनद आयोध्या काशी में भी नहीं है।      

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस वर्ष मजदुर दिवस यानी १ मई को  #BOREBAASIDAY के रूप में मनाने को कहा है, बोरे बासी छत्तीसगढ़ का केवल आहार ही नहीं बल्कि अपने भूमि प्रति प्रेम और अमूल्य संस्कृति का प्रतिक है, इस दिवस के जरिये हम उन मजदूरों का सम्मान कर रहे है जिनका श्रम ही पूजा है। चुकी छत्तीसगढ़ परिश्रमी श्रमिकों का गढ़ है, श्रम को भगवान मानने वाले छत्तीसगढ़ियों के लिए यह दिवस बहुत ही महत्वपूर्ण है, छत्तीसगढ़ सरकार इन चीजों को बढ़ावा दे रही तो यह सराहनीय है। 

इस दिवस को सरहाते बहुत से साहित्यकार और लेखकों ने अपनी लेखनी प्रस्तुत की नारायण चंद्राकर जी लिखते है की 

छत्तीसगढ़ के बासी के 

मैं जरूर करहु बखान।

जेखर गुण के बारे में,

सबला होना चाहिए ज्ञान।

वे बासी के गुण गान समूचे विश्व में करने को कह रहे थे। 

गणेश्वर पटेल लिखते है की हमन अपन लोक खान पान मन ल संजो के रखबो, एला कभू नंदाए ल नई देवन, अउ एकर सुग्गर मिठासपन  ल गुरतुरपन ल चारों मुड़ा म बगराये के उदिम म करबोन अउ जबर गरब ले ए कहावत ल कहिबोन " ठंडा मतलब बोरे बासी ", वे छत्तीसगढ़ी लोक आहार को संजोने और उन पर गर्व करने के बात कर रहे थे।  

सुशील भोले जी लिख़ते है कि दिन आगे गरमी के, नंगत झड़क लव बासी 

दही महि के बोरे होवय , चाहे होवय तियासी

उन्होंने भी गर्मी के दिनों में बोरे बासी खाने की अपील की। 

गिरधारी लाल चौहान लिखते है कि संगी हमर बासी अमृत के समान, 

रोज बिहना खावन करके असनान, 

बटकी म हेरेन कंवरा कंवरा धरन,

चटनी पाताल मिरचा संग आथन 

उन्होंने भी बासी की खूबी को बखूबी बताया है, चटनी और मिर्च के साथ खाये जाने वाला ये छत्तीसगढ़ी आहार अमृत के समान बताया है। 

बहुत से साहित्यकारों ने बासी पर गहन लिखा है, आप भी खाये छत्तीसगढ़ का लोक आहार बोरे बासी, और आखिर में आप ल मोर बोरे बासी जोहार!  

-उत्कर्ष कुमार सोनबोइर  

जगदलपुर जिला बस्तर छत्तीसगढ़