धर्म के अनुरूप आदर्श होना चाहिए: स्वामी विवेकानंद गिरी

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

सहारनपुर। स्थानीय मण्डी समिति रोड कृष्णा नगर स्थित स्थानीय सिद्धपीठ श्रीश्री 1008 स्वामी तुरीयानन्द सत्संग सेवा आश्रम में आध्य सतगुरू श्रीश्री 1008 स्वामी तुरीयानन्द जी महाराज की 51वीं पुण्यतिथि गद्दीनशीन श्री श्री 1008 स्वामी विवेकानन्द गिरी जी महाराज की अध्यक्षता में स्वामी तुरीयानन्द ट्रस्ट (रजि0) द्वारा आयोजित एवं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड से पधारी विशाल संगत द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास व श्रद्धापूर्वक मनायी गयी।

नगर के प्रसिद्ध पं.चूडामणि एवं दीपक अग्निहोत्री द्वारा प्रातः सुंदरकाण्ड का पाठ कराया गया व सत्संग तथा संत प्रवचन हुए। 03 मई अक्षय तृतीया के पावन दिवस की प्रातः विशाल हवन कुण्ड में पंडित जी द्वारा श्रद्धापूर्वक हवन यज्ञ कराया गया।

स्वामी विवेकानंद गिरी महाराज ने कहा कि कोई आदर्श धर्म से बड़ा नहीं है। आर्दश एक श्रेष्ठतम अवस्था है, परन्तु अवस्था बदलती रहती है। इसी कारण धर्म भी बदलता रहता है, इसलिए धर्म के अनुरूप आदर्श होना चाहिए। महाभारत में दुर्योधन अधर्म का प्रतीक है, दोणाचार्य ने राष्ट्र से ज्यादा, धृतराष्ट्र के उपकारों को ऊपर रखा वो महर्षि भारद्वाज और अप्सरा धृताची के पुत्र थे। वे भी भीष्म व कर्ण की भांति भगवान परशुराम के शिष्य थे। कर्ण भी कुन्ती व सूर्यदेव के पुत्र थे। इसके बारे में एक कथा यह भी है कि कर्ण का जन्म एक वरदान स्वरूप हुुआ था। दुर्वासा ऋषि कुंवारी कुन्ती के लगातार एक वर्ष की सेवा से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि जब भी तुम किसी देवता का आहवान करोगी तो तुम सन्तान उत्पन्न कर सकती हो। कुन्ती ने उत्सुकता से जब सूर्यदेव का आहवान किया तो सूर्य समान तेज, कवच व कुण्डल धारण किये हुए कर्ण पैदा हुए।

महाभारत में एक अन्य उदाहरण शल्य नरेश का भी है जो धर्म के अनुरूप एक आदर्श है। नकुल, सहदेव के मामा शल्य नरेश जो मद्रराज (जो अब मध्य प्रदेश में है) के राजा थे। वे अपने पुत्रों व एक अक्षोहिणी सेना के साथ, पाण्डवों के बुलावे पर उनकी ओर से युद्ध के लिए चल दिये रास्ता लम्बा था रास्ते में दुर्योधन ने छल कपट से उनकी सेवा करके उनसे अपने पक्ष में तथा पाण्डवों के विरोध में युद्ध करने का वरदान प्राप्त कर लिया। 

इस तरह महाभारत में बहुत सारे योद्धा धर्म को जानते हुए भी अपने आदर्शाें के कारण उन्होंने अधर्म के पक्ष में युद्ध किया। आज भी स्थिति वही बनी हुई है, बल्कि अपने आदर्शों के कारण समाज व राष्ट्र के भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि धर्म का ज्ञान देने का कर्तव्य आज के समाज में स्त्री से ज्यादा पुरूष का है।

इस अवसर पर स्वामी तुरीयानन्द ट्रस्ट (रजि.) के अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश अरोड़ा, उपाध्यक्ष श्री महेन्द्र पाल ढल्ल, सचिव श्री प्रवीण वधावन, कोषाध्यक्ष श्री बिहारी लाल धमीजा तथा संयुक्त सचिव श्री सुभाष चन्द मल्होत्रा एवं स्थानीय तथा बाहय संगत ने उपस्थित होकर धर्मलाभ उठाया एवं विशाल भण्डारे का आयोजन हुआ।