मगफिरत का है दूसरा असरा, जकात से जरूरतमंदों की मदद कर पूरा करें अपना फर्ज

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

रमजान का दूसरा असरा मगफिरत का है। रमजान माह में रोजे रखने की तरह जकात भी फर्ज है। जकात का मतलब है दान देना। अपनी आय के एक हिस्से को जरूरतमंदों में बांटने को जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात को भी मुसलमानों पर फर्ज किया गया है।

साढ़े बावन तोला चांदी या फिर साढ़े सात तोला सोना होना या इनके बराबर की रकम जिस मुसलमान के पास है उस पर जकात फर्ज है। एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता है। जकात को पूरे साल भर में कभी भी दिया जा सकता है, लेकिन अधिकतर जकात को रमजान माह में दिया जाता है। जकात का सबसे पहला फर्ज अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों पर है। 

इसके अलावा मदरसों जहां बाहर के और यतीम बच्चे पढ़ते हों, वहां पर भी जकात दिया जाना चाहिए। जकात के लिए शरीयत में नियम बनाए गए हैं। अपनी कुल आय का ढाई प्रतिशत हिस्सा जकात में दिया जाता है। जो कर्जदार होता है उस पर जकात फर्ज नहीं है। 

कर्ज न होने के बावजूद जकात न देने वाले मुसलमान को फर्ज को छोड़ने के बराबर गुनाह मिलता है। इसलिए जकात देना बेहद जरूरी है। रमजान माह में सदका ए फित्र भी देना वाजिब है। सदका-ए-फित्र हर मालदार पर वाजिब है। जिस पर जकात फर्ज है उस पर सदका-ए-फित्र भी फर्ज है। सदका ए फित्र अदा करने की वजह यह है ताकि गरीब, यतीम भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें।