हैं मगर आती नहीं, मजदूर दिवस पर लिखूंगा..!

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क   

किसी को होती है तो आती हैं, किसी के पास होती ही नहीं तो आती भी नहीं। ये शर्म होती हैं, शर्मिंदा होते हैं तो खुद को बेइज्ज़ती सी महसूस होती है। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे मध्यप्रदेश के पेंशनर्स और छत्तीसगढ़ के पेंशनर्स दोनों की महंगाई राहत मांग मांग कर थक गये बेचारे, नियमित कर्मियों को तो महंगाई राहत बढ़ाये जाते हैं और जिन्दें पेंशनर्स की महंगाई राहत दबाये जाते हैं। बड़ी नाइंसाफी है। सरकार, खामोश हैं अब कुछ बोलती नहीं। पेंशनर्स को बुढ़ापे में राहत की सख्त जरूरत हैं। घर चलाना, इलाज का खर्चा चलाना, परिवार एवं आश्रितों की अन्य जिम्मेदारी पूरी करना हैं मगर सरकार नहीं चाहती की ये बुढ़ापे में अपनी जरुरतें पूरी करें। बढ़ती महंगाई, टैक्स निरंकुश होकर इन पर पहाड़ जैसे पड़ें हैं, आघात पर आघात दिये जा रहे हैं मगर यहां निष्ठुरता को, सरकार गले लगा रहा हैं।

यूनियनों में दम नहीं रहा दोनों राज्यों में और पेंशनर्स संघ कमजोर महसूस कर रहे हैं ऊपर-ऊपर कोरी हवाबाजी से काम नहीं होता। किसी दिन खुद ही हवा हो.जाऐंगे। कागज रंगने से , कागज पकड़ाने से, स्वागत, मालाऐं, कराने, पहनाने से, चंदा इकट्ठा कर जलसा करने से, खुद के लिए तालियां पिटवाने का काम अपनी तारीफ कराने, करने के अलावा कुछ नहीं प्रदर्शित करता। अपना गाल खुद बजाना सबको मालूम है। शक्तिहीन से हैं इनके दंड कमंडल, इनमें दमदारी होती तो ये दिन नहीं देखने पड़ते !

जबकि बहुत से पेंशनर्स नेता अपने को है आला समझते, बहुत से सोशल मीडिया पर दिखना, कमेंट्स राइटर, ब्लागधारी बन जाना और कुछ बड़ी-चढ़ी लफ्फाजी टिप्पणियां करने की ही नेतागिरी तक सीमित रहते। फिर नेताओं-मंत्रियों व सरकार को जगाऐगा कौन, महंगाई राहत के लिए  दबाव बनाऐगा कौन ।

मध्यप्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ सरकार को पत्र मार्च में ही भेज दिया था कि हम पेंशनर्स को महंगाई राहत देना चाहते हैं इस पर अपनी सहमति दे। अब अगर बात सहमति की वहां लटकी हैं तो जब एक महीने से अधिक समय तक सहमति नहीं आई (जो कि दो-चार दिन या एक सप्ताह से अधिक समय नहीं लगना था, इसके लिए) तो अब  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, या मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से, मुख्यसचिव से बात करें की वे महंगाई राहत के लिए वहां भेजे गये पत्र पर शीघ्र सहमति दें क्योंकि हमारे प्रदेश में महंगाई राहत केंद्र के समान पेंशनर्स को देना ही है और पेंशनर्स को महंगाई राहत पर  सहमति लेने की बार-बार की झंझट केंन्द्र से चर्चा कर हटावें। आगे पंचायत-निगम चुनाव और विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं इसलिए और अधिक देरी बर्दाश्त के बाहर हैं।

एक शर्म होती है जिसे गिरवी रख नहीं सकते। शर्म या तो आती है या फिर नहीं आती, क्योंकि हमें इज्ज़त प्यारी नहीं, शर्मायेदार नहीं। मांद में बैठे ठंडे वीर किसका इंतजार कर रहे हैं। कागजी, झकास, छपास, स्वागत, सत्कार करने कराने वाले कर्मवीरों, नेत्रनवीशों, यह जो

हो रहा हैं, वरिष्ठ पेंशनर्स जनों पर प्रहार क्या दिख नहीं रहा। क्यों दिखेगा आखिर आपका इनसे राबता क्या, यदि दर्द तुम्हें भी होता हैं तो पेंशन राहत सहमति पत्र पर कार्रवाई करावें, जनता की सरकार है इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ सरकार को जगाऐं और दबाव नहीं निर्णय करावें ताकि मध्यप्रदेश के पेंशनर्स को केन्द्र के समान पूरी  महंगाई राहत मिल सकें। यही सोचकर मैंने पेंशनर्स का दुखड़ा लिखा हैं अब देखना हैं कि इसके लिए मध्यप्रदेश के व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कितने संवेदनशील होते हैं, अपने आप की सरकार को क्या,

निरीह, बेचारे प्रचंड महंगाई, बढ़ते हुए टैक्स के मारे पेंशनर्स के हित में कितनी दयालुता प्रकट करते हैं, अपने को पेंशनर्स हितैषी साबित करते हैं। अरे भूख इन्हें भी लगती हैं, महंगाई इन्हें भी डंसती है। सब जितनी रोटी खाते हैं उतनी इनको भी लगती है। अधिक उम्रजनित

बीमारी इनको भी तो होती हैं, ऐसे में इन्हें महंगाई राहत दिलाकर पुण्य का काम करें, हमारी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की सरकारें....! इसीलिए मैंने सोचा लिखूं, नहीं लिखूंगा तो शर्म तो है मगर आती नहीं, मजदूर दिवस पर ही लिखूंगा ! किसी मशहूर शायर जावेदजी, फनकार की चार लाइनें साभार उदृत हैं कि-

    हालात   ये  कहते  हैं,  के  तन्हाई   है   बेहतर

    तन्हाई  ये  कहती  है,  सज़ा   हो   के    रहेंगे।

    ये   लोग   बहुत   अपनी   हवा   बांध  रहे   हैं

    ये   लोग   किसी   रोज़   हवा  हो   के   रहेंगे।

                  - मदन वर्मा " माणिक "

                    इंदौर, मध्यप्रदेश