मन के दरवाजे

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

होते मन के दरवाजे 

तो खोल तुम्हें दिखलाते,

कितनी पीड़ा है समाई

भीतर जाकर गहराई,

सांसे यू ना थम जाती

कोई खिड़की जो होती

तम इतना ना छा जाता

जलती कोई तो ज्योति,

कोई सुराग जो होता

तो तुमको दिखला देते,

जो बर्फ जमी है मन पर

कैसे भी पिघला देते,

यह सब भी ना कर पाते,

तो भी थी यही तमन्ना

मन यूँ अदृश्य ना होता

होता इसका भी कोना,

होते खिड़की दरवाजे

जिनमें लग जाता ताला,

घूमता निडर मेरा मन

सारे जग में मतवाला।

©डॉ0 श्वेता सिंह गौर, हरदोई