...मन में लड्डू फूटा

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क   

एक बेरोजगार चूहे ने देखा वादों की बड़ी बोतल में रोजगार के ढेर सारे लड्डू हैं। यह आँखों का धोखा है या फिर ठगने की नई चाल, उसे समझ नही आया। कुछ देर इधर-उधर देखा तो जाना कि यहाँ तो एक से बढ़कर एक मनलुभावन वादों का बाजार लगा है। रोजगार का लड्डू अकेला नहीं, इसके सहचर भी ललचाने बैठे हैं। किसानों को समर्थन मूल्य की बूंदी, बूढ़ों को पेंशन का चमचम, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा की रबड़ी, स्मार्ट शहरों के गुलाब जामुन सब अलग-अलग वादों की बोतलों में समाये हैं। लंबी-लंबी फेंकने की जलेबी का तो अलग आकर्षण है। चखने के लिए एक मुँह बस नहीं हो सकता।  उन जलेबियों पर पैकेजों का मक्खन तो और चटकदार लगता है। जहाँ देखो वहाँ वादों की मिठाई दिखती है। थोड़े छोटे तो थोड़े बड़े लगते हैं। यहाँ गरीबी की मिर्ची, कंगाली का आटा, पिछड़ेपन की करेली कड़वाहट का नामोंनिशाँ नहीं है।

इन वादों की मिठाई वाली जादूगरी तो देखो कि इन सबसे मधुमेह हो सकता है, फिर भी सभी दौड़े-दौड़े चले आ रहे हैं। भूखे और तड़पते मरने से अच्छा है कि चंद मिनटों की मीठी मौत ही सही। जमाना वादों की मिठाई खाना चाहता है। तरह-तरह की मिठाई का लुत्फ उठाना चाहता है। यहाँ शिरखुर्मा को जिहादी कहकर मोदकों से भिड़वाया जा रहा है। मोदकों को रसगुल्लों से ल़ड़वाया जा रहा है। चूंकि भिड़ना, लड़ना दोनों मीठे हैं, चूहे बेवकूफ बनते जा रहे हैं। चूहा भूल चुका है कि वह चूहा है। जमाने के साथ-साथ उसे फंसाने के तरकीबें बदली हैं, लेकिन वह नहीं बदला।

इस बार चूहा मुफ्त वादों के लड्डू वाली बोतलों की मौज ले रहा है। जब तक लड्डू हैं तब तक उसके दिन अच्छे हैं। यहाँ वादें बदलते हैं, चूहे नहीं। वादे खत्म के होने साथ चूहा खाली बोतल की थाह में फंसकर रह जाएगा। वह लाख कोशिश करेगा बाहर निकलने की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। तभी झूठे वादों की मिठाई बनाने वाला आएगा और धीरे से ढक्कन बंद कर देगा। यह ढक्कन बंद करने का खेल सदियों से चला आ रहा है और इन मिठाइयों के नाम पर चूहे हमेशा से फंसते जा रहे हैं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’