काट दिए मेरी कलम के पर

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क


तमन्ना थी कभी खुद को , मैं  खूब संवारूंगी

सौलह श्रंगार करके  ,  मैं खुद कि ही नज़र उतारूंगी।।


आया वो  वक्त  जब तमन्नाओं को पूरा हमें करना था

मुझे क्या पता था ,  तमन्नाओं को मैं सीने में ही दबाऊंगी।।


कहते हैं ,  तुम्हारा दायरा सिर्फ घर कि ये चार दीवारी है

सोचती हूं ,  जमाने से क्या अब मैं न कभी मिल  पाऊंगी।।


कब तलक खुद कि तमन्नाओं का दम़ मैं घोंटू

कब तलक , शब्दों को सजा मैं खुद को मरहम लगाऊंगी।।


उड़ना चाहती , कलम के पर लगा मैं खुले आसमां में

काट दिये मेरी कलम के पर , क्या मैं अब उड़ ना पाऊंगी


हो रही वीणा की झंकार भी अब कुछ मधम-मधम

वीणा कि झंकार के सुर , लगता है अब मैं खो ही जाऊंगी।।


वीना आडवाणी तन्वी

नागपुर, महाराष्ट्र