पथिक

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क   

पथिक बन कर ही तो हम सारे, इस धरती पर आये हैं,

सुख की राहें हैं अगर कहीं, तो कहीं छाये ग़म के साये हैं

वह पथिक भला क्या चल पाएगा, जो ग़म से घबरा जाएगा,

इस अग्नि पथ पर वही बचेगा, जो मुश्किलों से टकरा जाएगा,

कांटे मिलेंगे अगर राहों में, तो फूलों का मंजर भी आएगा,

रोड़े बिछाएगा कोई, कोई हाथ पकड़ कर साथ निभाएगा,

कुछ ऐसे मोड़ भी आयेंगे, जो राह से तुझे भटका ले जाएंगे,

तू अपनी राह स्वयं बनाना, वह मोड़ स्वतः ही ख़त्म हो जाएंगे,

जीवन की इस पगडंडी पर, तुझे बिना रुके ही है चलते जाना,

जो रुक गया, समझ लेना, राह का तय है वहीं ख़त्म हो जाना,

ख़ुशनसीब होते हैं पथिक वह, जो लंबी राह तय कर पाते हैं,

कुछ दो चार कदम चल गिर जाते, रास्ते वहीं बंद हो जाते हैं,

पथरीली राहों पर गिरते चलते, पाषाण सा मज़बूत होना होगा,

मंज़िल पर पहुँचना है अगर, तो तुझे संघर्ष करते रहना होगा।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)