गैया मैया और ता ता थैया

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

गाय और माँ  दोनों शब्दों का अटूट संबंध है। दोनों दूध देने तक पूजनीय होती हैं। दूध देना बंद तो समझो रिश्ता खत्म। दोनों के दूध की यह विशेषता होती है कि वे संतानों को हृष्ट-पुष्ट बनाती हैं। हृष्ट-पुष्ट भी इतना कि जब तक संतानों का शरीर मजबूत न हो जाए तब तक। जब शरीर मजबूत बन जाता है और स्वार्थ सारे साध लिए जाते हैं, तो दोनों को धक्के मारकर हकाल दिया जाता है। जिनके पास पैसा है वे अपनी माताओं को वृद्धाश्रमों में जिनके पास नहीं है उन्हें रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडो, सड़क चौराहों पर छोड़ दिया जाता है। ऐसी संतानों के बीच रहने का कोई न कोई फल मिलना तो चाहिए न! सो वही फल उन्हें मिल जाता है। वृद्धाश्रम में छोड़ी माताएँ और कसाईबाड़ा की गायों में कोई खास अंतर नहीं है। दोनों का अंत दुखद होता है। एक अपने सपने की बलि चढ़ाकर तो दूसरी अपने शरीर की। दूसरी किस्म की माताएँ और गायें जो वृद्धाश्रम से इतर अन्य स्थलों पर छोड़ दी जाती हैं उनके आंकड़े चित्रगुप्त के सिवाय किसी और के पास नहीं होते। गुमशुदा सामानों के लिए एक बार इंसान जरूर ढूँढ़ता है, लेकिन इनके लिए हरगिज नहीं।

दुर्भाग्य से माताएँ मात्र शास्त्रों तक पूजनीय हैं। वास्तविकता के धरातल पर उन्हें गायों से भी गया गुजरा समझा जाता है। माँ केवल बच्चों को जन्म दे सकती हैं, पाल-पोस सकती हैं। उन्हें बड़ा कर सकती हैं। किंतु देश की रीढ़ या वोट कतई नहीं बन सकती। गायें भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और राजनीति के लिए वोट भी। व्यंजना के शब्दकोश में गाय का अर्थ चलती फिरती वोट बटोरने वाली ईवीएम मशीन के रूप में पाया जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि यह जीव न होता तो भारत में चुनाव का स्वाद फीका पड़ जाता। शेष दुनिया में इंसानी मुद्दों पर चुनाव होते हैं, तो हमारे यहाँ जानवरों पर। यह हमारे विकास की निशानी है।

चुनाव समाप्ति के बाद मेरी भेंट एक गाय से हो गई। अब वह सेलिब्रिटी नहीं थी। इसीलिए हर किसी को दिख जाती थी। किंतु वह इंसानों को देखकर ऐसे भाग जाती जैसे कि वह कोई नेता या मंत्री हो। बाद में पता चला कि पिछले पाँच-छह दिनों से वह भूखी है। किसी ने उसे रोटी का एक टुकड़ा देना भी उचित न समझा। अब बेचारी क्या करती। कचरे के ढेर में घी वाला टीन का छोटा डिब्बा दिखा। लालच में आकर मुँह डाल दिया। फिर होना क्या था टीन का डिब्बा उसके निचले जबड़े में फँस गया। जहाँ रोटी का टुकड़ा देने में लोगों की नानी मरी जाती है, वे भला एक बूँद घी कैसे छोड़ सकते हैं। सो बेवकूफ गाय को घी के बजाय निचले जबड़े पर अधखुले धारदार ढक्कन वाले टीन के डिब्बे के घाव मिले। उसकी यह दशा देखकर कुछ दयालु इंसान उसकी सहायता करने के लिए आगे आते तो वह उन्हें देखकर दूर भाग जाती। उसे भूखे मरना पसंद है, लेकिन इंसानों की छाया में जाना कतई नहीं। शायद उसे पता चल गया था कि व्यंजना के शब्दकोश में इंसान का अर्थ अविश्वासी जीव है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657