युद्ध हो रहा है

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


सूरत-ए-हाल दुनिया का ये क्या हो रहा है

लौमड़ भर रहा तिजोरी और जोकर रो रहा है

 

जंग-ए -वतन में आम आदमी पिस रहा है

अहम के सिलबट्टे पर राजा सेना को घिस रहा है

 

जो था कल तक सरपंच सबका

वही आज घर-घर जाकर जूते घिस रहा है

 

किस बात पर अकड कर फिर रहे हो तुम

चापलूसी करते-करते मन क्यों नहीं थक रहा है  

 

बार-बार साथियों को पुकारने लगे हो सभाओं में

थोड़ी जमीन बची है,आसमान भी खिसक रहा है

 

दुश्मनों के भी आपस में होने लगे हैं रोज नए सौदे  

शय और मात के खेल में एक देश जल रहा है


वंदना जैन