होली

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क


महानगर है,भागदौड़ की स्थली

भूलें नहीं,सार्थक रंग-पर्व संदेश।

सूखी लकड़ी,उपलों से,

होता होलिका-दहन।

अनुपम,अनेक रंगों से

तन-मन होते एक-भावी,

होली पर्व-संदेश युग-धर्म यह।

देश,जाति,धर्म के भेद,

रंगों के मधुर - मिलन में हों तिरोहित।

भरते अभेद-मन में,

निरभिमान होने का ज्ञान सतत।

होली-रंग से जुड़ते,

सजते है,सभी देश,

रूप हो सकते अलग-अलग,

रंग-एक है,प्रेम-भाईचारा।

कण-कण धरा का,

हो रहा कृष्ण-मय,

राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला है,

ईश की चिर विरह-मिलन लीला यह।

इस रंगोत्सव,जन-मन का,

निसर्ग से प्रिय-मिलन हो।

व्यष्टि-रूप कृष्ण-भाव,

समष्टि में राधा-भाव

दिव्य अनुराग-महोत्सव हो।


@ मीरा भारती,

  पुणे, महाराष्ट्र।