परिवारवाद में फंसी राजनीति

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क   

स्वतन्त्र भारत में जब संविधान ने संसदीय लोकतन्त्र को अपनाते हुए बिना किसी भेदभाव के भारत की धरती पर रहने वाले प्रत्येक वयस्क महिला व पुरुष नागरिक को सरकार चुनने के लिए एक वोट के अधिकार से सम्पन्न किया तो सदियों से चली आ रही सामन्ती व राजतन्त्रीय व्यवस्था के मृत्यु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर कर दिये और पूरी दुनिया में ऐलान किया कि अंग्रेजों की दासता से मुक्त भारत के लोगों के हाथ में वह ताकत सौंपी जा रही है जिसकी मार्फत किसी जमींदार या जागीरदार की चाकरी करने वाला व्यक्ति भी लोगों के समर्थन से शासन के ऊंचे से ऊंचे पद पर पहुंच सकता है। इसे तब  भारत का संविधान लिखने वाले डा. अम्बेडकर ने राजनीतिक स्वतन्त्रता का नाम दिया और इसके साथ ही जोड़ा इस औजार की मार्फत आर्थिक स्वतन्त्रता का प्रयत्न भी किया जाना चाहिए। 

इस राजनीतिक स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने के लिए डा. अम्बेडकर ने एक हिदायत भी दी थी कि पुरानी व्यवस्था के तहत शासन करने वाले वर्गों को इस वोट की ताकत का इस्तेमाल अपने हक में करने से रोकने के लिए बहुत जरूरी होगा कि वोटों का झुंड तैयार करने की समाज में प्रतिष्ठित समझे जाने वाले किसी भी व्यक्ति की कोई तरतीब सफल न होने पाये वरना लोकतन्त्र मंच ही नये रजवाड़े पैदा हो जायेंगे। विभिन्न सामाजिक विसंगतियों और वर्जनाओं में फंसे भारत के लोगों को डा. अम्बेडकर चेतावनी दे रहे थे कि जातियों की चौधराहट अपने हाथों में रखने वाले लोगों को किसी भी सूरत में ‘व्यक्ति पूजा’ की संस्कृति पनपाने की इजाजत न दी जाये। इससे लोकतन्त्र में वोटों की ही इजारेदारी का खतरा पैदा हो जायेगा।

 जाहिर है कि बाबा साहेब अम्बेडकर का इशारा वंशानुगत या परिवार परक राजनीति की तरफ था क्योंकि गुलाम भारत में अंग्रेजों ने इसी आधार पर अपनी शासन प्रणाली को जमाया था। उन्होंने 1935 में जब पहली बार प्रान्तीय एसेम्बलियों के चुनाव कराये थे तो मुश्किल से 11 प्रतिशत लोगों को ही मत देने का अधिकार दिया था जिनमें आयकरदाता, जमीदार, जागीरदार व संभ्रान्त कहे जाने वाले पढ़े-लिखे लोग ही शामिल थे परन्तु स्वतन्त्र भारत में एक दलित वर्ग के एक मजदूर से लेकर रियासतदार को एक बराबर का हक देकर यह तय करने की कोशिश की गई थी कि चुनावी मैदान में किसी रईस या राजा का मुकाबला कोई रंक भी कर सकता था। 

मगर क्या वजह है कि वर्तमान समय में परिवारवादी राजनीति का इस तरह बोल- बाला हो गया कि पूरे के पूरे राजनीतिक दल ही एक ही खानदान की ‘रियासत’ बनने लगे और उनके चुनाव जीतने पर पिता के बाद उसके पुत्र का ही शासक की गद्दी पर बैठने का अधिकार स्वाभाविक समझा जाने लगा। इसका मुख्य कारण वही है जो 74 साल पहले डा. अम्बेडकर ने बताया था। लोकतन्त्र में जिस तरह क्षेत्रीय स्तर पर व्यक्ति पूजा का चलन बढ़ा उसी के साथ परिवारवाद भी बढ़ता चला गया परन्तु लोकतन्त्र में जब मतदाता अपने वोट की कीमत को पहचान लेता है तो परिवारवाद का वही हश्र होता है जो पंजाब में हुआ है।

 देश के सबसे पुराने क्षेत्रीय दल अकाली दल को जिस तरह प्रकाश सिंह बादल के परिवार ने अपनी जेबी पार्टी बना कर रख दिया था, उसे मतदाताओं ने एक ही झटके में चौराहे पर बिखेर दिया। मगर उत्तर प्रदेश में हम इसका एकांकी स्वरूप ही देख सके क्योंकि राज्य में विशुद्ध परिवारवाद के बूते पर ही सत्ताधारी भाजपा को चुनौती देने वाले समाजवादी पार्टी व लोकदल के अखिलेश-जयन्त चौधरी गठबन्धन को आंशिक सफलता मिल गई और इनकी सीटों में इजाफा हो गया। 

यदि लोकतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर सवाल पूछा जाये कि अखिलेश और जयन्त चौधरी की काबलियत क्या है तो उत्तर यही मिलेगा कि अखिलेश बाबू माननीय मुलायम सिंह के बेटे हैं और जयन्त चौधरी चरण सिंह के पोते हैं। राजनीति न तो कोई खानदानी पेशा होता है और न कोई कदीमी दूकान होती है कि पिता के बाद बेटा उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाये। बल्कि जनतन्त्र की यह ऐसी बीमारी होती है जो मतदाताओं की हैसियत लोकतन्त्र के मालिक की जगह नौकर की बना डालती है। 

मगर इसी उत्तर प्रदेश में हमने यह भी देखा कि राज्य की चार बार मुख्यमन्त्री रहीं सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी की केवल एक सीट ही आयी। इसे एक शुरूआत जरूर कहा जा सकता है क्योंकि मतदाताओं ने मायावती की मतदाताओं को बन्धक समझने की राजनीति को जोरदार पटखनी दी है। यह सवाल भी स्वयं में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि जब 2012 में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था और इस पार्टी की विधायक मंडल दल की बैठक लखनऊ में हो रही थी तो उसी बैठक में इसी पार्टी के नेता आजम खां ने अपनी पीड़ा यह कह कर व्यक्त की थी कि ‘अब हमें मुलायम सिंह यादव की औलाद को भी नेता बनाना पड़ रहा है’। 

अगर हम विभिन्न राज्यों की तस्वीर भी देखें तो वह भी हमें परिवारवाद से रंगी हुई मिलेगी। महाराष्ट्र में शिव सेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के पुत्र मुख्यमन्त्री हैं तो पोते मन्त्री हैं। तेलंगाना में भी विपक्षी एकता के लिए कुलबुलाते मुख्यमन्त्री चन्द्रशेखर राव की सरकार का हाल भी यही है। क्या लोकतन्त्र में किसी राज्य की सरकार में पिता व पुत्र दोनों का ही मन्त्री होना किसी सीनाजोरी से कम कहा जा सकता है ? हमने जम्मू-कश्मीर में भी यही देखा है कि शेख अब्दुल्ला का परिवार ही सत्ता पर काबिज रहा वरना मुफ्ती मुहम्मद सईद के बाद उनकी पुत्री महबूबा मुफ्ती का। तमिलनाडु में भी पिता के बाद पुत्र स्टालिन बड़ी शान से गद्दी पर बैठ गये।

 ओडिशा में तो जैसे बीजू पटनायक के पुत्र नवीन पटनायक मुख्यमन्त्री पद का पट्टा लिखवा कर लाये हैं। दरअसल यह सब इसलिए हुआ कि मतदाता अपनी ताकत को पहचानने में भूल करते रहे। लोकतन्त्र की मजबूती की सबसे बड़ी शर्त यह होती है कि मतदाता सबसे मजबूत हो। इसकी मजबूती केवल आर्थिक स्वतन्त्रता या आजादी से ही आ सकती है। बाबा साहेब ने यह हिदायत भी 74 साल पहले ही दी थी। अतः जो राजनीतिक पंडित उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों को लेकर माथापच्ची कर रहे हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि राज्य की योगी सरकार ने इसी मोर्चे पर सबसे ज्यादा काम केन्द्र की मोदी सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू करके किया।