धर्म को राजनीति से अलग करना घातक है

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

जब मैं राजनीति और धर्म को देश की प्रगति के लिए रथ के दो पहिए के रूप में होने की बात कर रहा हूँ तो मैं यह समझ रहा हूँ कि धर्म कभी भी अशांति का कारण नहीं बनता।साथ ही यह भी साफ़ कर देना चाहता हूँ जो लोग धर्म के नाम पर अशांति या उत्पात का कारण बनते हैं उन्हें धार्मिक या मानव कहना सबसे बड़ी भूल है।बार बार यह सुनने में आता है कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए।मेरे विचार से यह तर्क बिलकुल गलत और स्वार्थ से परिपूर्ण है ।ऐसा कहने वाले धर्म के वास्तविक स्वरूप से पूरी तरह या तो अनजान हैं या उपद्रवियों के पक्षपाती हैं।धर्म हमेशा पोषण और रक्षण का साधन रहा।ऐसे धर्म को जिसने भी अफ़ीम कहा उसने विश्व के साथ धोखा किया।यह बेहद चिंताजनक है कि किसी एक व्यक्ति या उसके समर्थकों द्वारा अपने विचारों को लोगों पर थोपने के लिए जो लिखा या बताया गया उसे धर्म कह दिया गया और उसके प्रचार-प्रसार के लिए जो संप्रदाय बनाया गया उसे धार्मिक संगठन कह दिया गया ।वास्तविकता यह है कि इस तरह के लोगों को धर्म से कभी मतलब ही नहीं था।यह सच है कि हमारे संविधान में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात कही गई है लेकिन जनता को गुमराह करने के अलावा इसका कुछ विशेष अर्थ समझ नहीं आता। आंदोलनों के नाम पर जाम लगा दिया जाता है, चुनाव के समय संख्या और  जातीय समीकरण देखते हुए राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट देने से गुरेज़ नहीं करते।अब फिर वही बात कि धर्म की राजनीति में क्या ज़रूरत ? तो मैं कहता हूँ कि राजनीति में धर्म उतना ही ज़रूरी है जितना सूर्य के लिए तेज़,चंद्रमा के लिए शीतलता और कुछ पावन बनाने के लिए गंगाजल ।क्या यह सच नहीं है कि विश्वामित्र ,मुनि अगस्त्य और ऐसे ही न जाने कितने ऋषियों-मुनियों ने श्रीराम को अपनी धार्मिक और यौगिक शक्तियों से सुसज्जित कर दिया  और इसी के कारण रामराज्य की स्थापना हुई।गुरु संदीपन से श्रीकृष्ण को विद्यादान दिया ।चाणक्य ने चंद्रगुप्त को तैयार किया ।ये कुछ उदाहरण हैं जो यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि धर्म का मूल और वास्तविक रूप जब व्यावहारिक धरातल पर उतरता है तब उसका परिणाम हमेशा कल्याणकारी ही होता है।आज के परिवेश में संभवत: ऐसा न हो पाने के कारण ही हम स्वयं को अज्ञानी न मानकर धर्म को दोषी ठहराते हैं ।यह कहने में मुझे बिलकुल भी झिझक नहीं है कि धार्मिक कर्मकांड आत्मिक शक्तियों के विकास और धार्मिक अनुशासन के सोपान हैं ।इनकी आवश्यकता तब तक बनी रहती है जब तक हम पूर्णरूप से धार्मिक नहीं हो जाते।जिस देश के लोग जितने अधिक  धार्मिक होते हैं उस देश में उतनी ही अधिक शांति होती है।आज विश्व के देश  अरबों -खरबों की संपत्ति विनाशक हथियारों को खरीदने पर खर्च कर रहे हैं।ऐसा करने के कारण  जनता के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है ।इसकी जड़ में वैश्विक अशांति का होना है ।यह सब इसीलिए हो रहा है कि लोग धर्म जो कि मानवता का पोषक और रक्षक है उसकी मौलिकता को भूलते जा रहे हैं और संप्रदाय को धर्म समझने की भूल कर रहे हैं ।सारांश यह है कि राजनीति को धर्म से अलग करना किसी भी राष्ट्र में अशांति को जन्म देगा ।जिस राष्ट्र के लोग जितने धार्मिक होंगे उस राष्ट्र में उतनी ही अधिक शांति होगी और वहाँ के लोगों का नैतिक और चारित्रिक उत्थान भी उतना ही अधिक होगा।

लेखक-

भूपेश प्रताप सिंह 

पट्टी, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश