पड़ोसी रूस तो मैं हूँ यूक्रेन...

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

एक दिन पड़ोसी से मेरा झगड़ा हो गया। न जाने उसके सिर पर कौन सा भूत सवार रहता है जो चौबीसों घंटे हमारी निगरानी करता रहता है। समझ नहीं आता कि पड़ोसी है या रूस का राष्ट्रपति पुतिन। यह दुनिया भी बड़ी गजब है। अपना छोड़कर सब का हिसाब किताब चाहिए होता है। कब, कौन, कहाँ, क्यों, कैसे और किस काम के लिए पड़ोस के घर आया है यही पता लगाने में लोग घर-घर ब्योमकेश बक्शी बनते जा रहे हैं। इन्हीं के चलते घर से निकलना दुश्वार हो गया है।

हां तो मैं आपको बता रहा था कि पड़ोसी से मेरी कहा-सुनी हो गई। मामला हाथापाई से होते हुए थाने तक पहुंच गया। थाना तो थाना है साहब! बड़ी गजब की जगह है। कुछ के अनुभवों को रेखांकित किया जाए तो थाना जाने की जगह श्मशान जाना सबसे बेहतर होता है। श्मशान इसलिए कि थाने में भी वही कुछ होता है जो श्मशान में होता है। अंतर केवल समय की मात्रा का होता है। जो काम श्मशान में जल्दी से होता है वही काम थाने में बड़े इत्मीनान के साथ किया जाता है।

हम दो झगड़ालू अपने-अपने ढंग से हाथापाई की आपबीती भूतकाल के संजय की त्रह सुना रहे थे। पुलिस बाबू ने एक लंबी सी जम्हाई ली जिसमें बीस-तीस मक्खी आसानी से घूम-फिर सकते थे। किंतु थाने की मक्खियां आम लोगों से ज्यादा समझदार होती है। वे पुलिस के इर्द-गिर्द मंडराकर अपनी मौत को दावत देने से साफ-साफ बचती हैं। उन्हें पूरा यकीन है कि पुलिस आरोपी के न मिलने पर कहीं इन्हीं के नाम पर बिल न फाड़ दे।

पुलिस बाबू ने कहा - तुम दोनों की हाथापाई में कोई दम नहीं है। न हाथ टूटा है न पैर। ऐसे कैसे मुंह उठाए चले आए। यह पुलिस थाना है पुलिस थाना! कोई कॉमेडी सर्कस नहीं। यहां मिनिमम रिपोर्ट हाथ पैर टूटने से दर्ज की जाती है। अब आगे तुम्हारी मर्जी।

हम दोनों झगड़ालू अपनी जिद पर अड़े रहे। कुछ न कुछ करके एक-दूसरे को मजा चखाना चाहते थे। पुलिस बाबू हमारी मंशा भांप गए और बोले - जब तुम लोग इतनी जिद कर ही रहे हो तो तुम्हारी बात मान लेता हूं। लेकिन एक शर्त है कि दोनों अपना-अपना केस मजबूत करने के लिए बड़े-बड़े आरोप लगाएं। नहीं तो एक काम करो। हमारे यहां कुछ स्कीमें चल रही हैं। जैसे गाली-गलौज पर हाथापाई का आरोप फ्री या फिर हाथापाई के साथ बलात्कार का आरोप। इससे भी खुशी नहीं मिलती तो मेरी जेब का वजन बढ़ाकर ये सारे के सारे एक साथ थोप दो। ऐसी चार्ज शीट बनाऊंगा कि तुम तो क्या तुम्हारे स्वर्गवासी दादा के दादा भी अंदर हो जाएंगे और बाहर आने का नाम भी न लेंगे।

यह सब सुन हम दोनों एक-दूसरे का मुंह ताकते रह गए। हम समझ गए थे कि थाने में धंधा मंदा चल रहा है। इसलिए सारी वसूली हमी से करना चाहते हैं। हम दोनों ने निर्णय किया कि चाहे तो खुद को दो-चार लात और मार लेंगे पर थाने की सीढ़ियों पर कदम न रखेंगे। चूंकि थाने तक पहुंचने के लिए पैरों की जरूरत पड़ती है इसलिए चुपचाप यहां से खिसक जाने में भलाई है। वैसे भी थाना वह चक्रव्यूह है जहां भगवान भी फंस कर रह जाते हैं और उनकी सारी शक्तियां वन प्लस वन स्कीम चलाऊ पुलिस के सामने धरी की धरी रह जाती हैं। काश यह बात यूक्रेन और रूस समझ पाते।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657