सोचो जरा उनके बारे में भी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


तुम दुखी हो

कि इन सर्दियों में महंगी

ब्रांडेड रजाई नहीं खरीद पाए,

जिन्हें मयस्सर नहीं

कड़कती सर्दी में शरीर पर

एक अदद कपड़ा,

कभी सोचा है 

कितने दुखी होंगे वो?


तुम दुखी हो

कि वजन कम नहीं हो रहा

महंगे तरीके अपनाकर भी,

जिन्हें मयस्सर नहीं

खाने को दो जून की रोटी,

कभी सोचा है

कितने दुखी होंगे वो?


तुम दुखी हो

कि महंगी गाड़ियां नहीं हैं

तुम्हारे पास अभी,

जिन्हें मयस्सर नहीं

चलने के लिए पांव में

चप्पल भी,

कभी सोचा है

कितने दुखी होंगे वो?


तुम दुखी हो

कि काम के चलते 

वक्त नहीं मिलता तुम्हें

जिंदगी का आनंद लेने का,

जिन्हें मयस्सर नहीं

भरोसा अगले पल का 

कि कब जैसे गोलीबारी

बमबारी हो जाए,

कभी सोचा है

कितने दुखी होंगे वो?


                जितेन्द्र 'कबीर'