शहीदों की निशानी है भूरागढ़ दुर्ग

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

बांदा। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने 33 सौ क्रांतिकारियों को यहां मौत दी थी। तीन हजार क्रांतिकारी भूरागढ़ दुर्ग में मारे गए थे। ऐसा कुछ इतिहासकार शोभाराम कश्यप कहते हैं। लेकिन बांदा गजेटियर में केवल आठ सौ लोगों के शहीद होने का जिक्र है। 18 जून 1859 में 28 व्यक्तियों के नाम विशेष तौर पर मिलते हैं जिन्हें अंग्रेजों की अदालत में मृत्युदंड व काला पानी की सजा सुनाई गई थी। गजेटियर के मुताबिक, 14 जून 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध शुरू होने पर बुंदेलखंड में उसका नेतृत्व बांदा के नवाब अली बहादुर द्वितीय ने किया था। इस क्रांति में अंग्रेजों का साथ देकर रणछोड़ सिंह दउवा ने गद्दारी की थी। यह विद्रोह इतना भयानक था कि इसमें इलाहाबाद (अब प्रयागराज), कानपुर और बिहार के क्रांतिकारी भी आ गए थे। क्रांतिकारियों ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मि. काकरेल की हत्या 15 जून 1857 को कर दी थी। 16 अप्रैल 1858 में हिटलक का आगमन हुआ, जिससे बांदा की विद्रोही सेना ने युद्ध किया था।इसमें तीन हजार क्रांतिकारी भूरागढ़ दुर्ग में मारे गए थे, लेकिन बांदा गजेटियर में केवल आठ सौ लोगों के शहीद होने का जिक्र है। 18 जून 1859 में 28 व्यक्तियों के नाम विशेष तौर पर मिलते हैं, जिन्हें अंग्रेजों की अदालत में मृत्युदंड व काला पानी की सजा सुनाई गई थी। भूरागढ़ दुर्ग के आसपास अनेक शहीदों की कब्र हैं। इसी युद्ध में सरबई के पास नटों ने भी बलिदान दिया था, जिसका स्मारक नटबली दुर्ग के नीचे बना है। मकर संक्रांति के अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रतिवर्ष एक मेले का आयोजन बुंदेलखंड पर्यटन विकास समिति कराती है।