'चीनी मांझे से गला कटाईल हो रामा'

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

सुधेन्दु पटेल

दोस्तों की दुआ से बच गया वरना अबतक तो तेरही की तय्यारी हो रही होती | एक सप्ताह पहले एक्टिवा चलाते हुए चीनी मंझे की चपेट में आ गया| गला रेता गया, ऊँगली ककड़ी की तरह नाख़ून सहित दो फांक हुई सो अलग | लगभग ज़िबह हुआ ही चाहता था | एक हाथ से रोजमर्रा की अपने काम निपताने में हलकान हुआ जा रहा हूँ | सब देह धरे का भोग है,जो उम्र की ढलान पर ज्यादा ही दुःख देता है |

     ऐसे में दो अत्यंत अर्ध-अबाहु शुभेच्छुओं के पराक्रम की याद ने संबल की तरह बल दिया | एक छोटे भाई सरीखे दादूपंथी महंत स्वामी नरेन्द्र पिपराली और दुसरे राजस्थान के स्मृतिशेष मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी , जिनसे एक इंटरव्यू लेने के दौरान जो स्नेह संपर्क बना वह स्थायी रहा | वह दौर उस स्वतंत्रता सेनानी के लिए कटु रहा था | जब उन्हीं के दल का युवा प्रधानमंत्री राज्य के दौरे पर उन्हें अपमानित कर गया था | उस औंचक बने प्रधानमंत्री राजीव गाँधी जबकि उनके पासंग बराबर भी न थे | एक के पास थी संघर्ष की थाती तो दुसरे के हत्थे परिस्तिथिवश सौगात | जाहिर है उनसे सवालों में निर्मम होना मेरी पेशेगत मज़बूरी थी, वे भी इससे बखूबी वाकिफ थे | तमाम राजनितिक सवालों से निपटने में वे सिद्ध थे, उन्हें दिक्कत होनी ही नहीं थी | लेकिन मेरे अंतिम सवाल पर वे भीतर तक विचलित हुए थे | उस छोटे-से हॉल में जहाँ हम बातचीत कर रहे थे 'त्रिपुरा सुंदरी' की कष्ट-मंदिर के अलावा दीवारें तक नंगी थीं| मैं हैरत में था की अतिथियों से मिलने वाले हॉल में नेहरु खानदान के किसी भी प्राणी का फोटो-फ्रेम तक टंगा न था | उस दौर में यह किसी अपराध से कम न था | मेरे इसी सवाल पर उन्होंने लपक कर टेप का बटन बंद कर दिया और तल्खी के साथ बोले , 'ख़त्म करो, बहुत हो गया' | 

      यह आकस्मिक नहीं था की 'सरिस्का कांड' की कटुता उनके दिमाग पर तबतक तारी थी , मेरे अंतिम सवाल जले पर नमक सा असर कर गया | चुपचाप खोला-टेप समेत निकल लेना ही उचित लगा | कहीं शंका भी थी कि टेप का कैसेट न छीन जाये | 

  जयपुर के अजमेर रोड स्थित फार्म वाले बंगले के बाहरी गेट तक के अधरस्ते पहुंचा ही था की पीछे से हांक सुनाई दी, पलट कर देखा | जोशी जी नंगे पैर मेरी और बढ़ रहे थे | उनका अमला हद्प्रभ सा चौकन्ना खड़ा हुआ था| मैं भी असहज उनकी और बढ़ चला | निकट होते ही कंधे पर हाथ रख आत्मीय मुद्रा में कातर स्वर बोले, 'बेटा ध्यान रखना, मेरा अहित न हो |' 

              मेरे पत्रकार-जीवन का यह पहला अनुभव था | धमकी-लालच से तो सबका पड़ता ही रहा था | पिटते-पिटते भी बचा था |'दिनमान' की एक रपट 'शेरपुर कलां दहन' पर दबंग-जाती वालों ने मेरे हत्या की सुपारी तक दे दी थी | उसी जाती के संपादक-साहित्यकार गिरिजेश रॉय ने अपने सरंक्षण में तब मेरी जान बचायी थी | 

   लेकिन यहाँ तो अनुनयी 'बाप' सामने था, बेटा क्योंकर न झुकता | मैंने भरोसा दिलवाते हुए उनके चरण छू लिए | उनकी स्नेहिल हथेली मेरे सिर पर थी | उसी ऊष्मा को थाहते हुए ढिंढोरची राष्ट्रवादियों के दौर में 'चीनी मंझे ' के हमले को झेल रहा हूँ गुरु !