सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में लगी भाजपा

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

उत्तरप्रदेश चुनाव में सांप्रदायिक धु्रवीकरण पर भाजपा अब पूरी तरह से लग चुकी है। कन्नौज से भाजपा सांसद सुब्रत पाठक ने बयान दिया है कि जिनकी मानसिकता भारत के खिलाफ है और जो लोग भारत में शरिया का सपना देख रहे हैं ऐसे लोगों का वोट भाजपा को नहीं चाहिए और ना ही वे लोग भाजपा को वोट देने वाले हैं। इस बयान से एक बार फिर भाजपा ने ये जतला दिया है कि चुनावों में वह हिंदू-मुस्लिम एजेंडे के साथ उतरने वाली है। इससे पहले मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी कब्रिस्तान का जिक्र छेड़ ही चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन में शिवाजी और औरंगजेब का नाम लेकर बता दिया था कि मंदिर के बहाने वह किस तरह की राजनीति कर रहे हैं। पिछले महीने ही योगी सरकार के मंत्री रघुराज सिंह ने कहा था कि मदरसों से आतंकी निकलते हैं और अगर उन्हें भगवान ने मौका दिया तो वह सारे मदरसों को बंद कर देंगे। इसी तरह उत्तरप्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में जालीदार टोपी वाले लुंगी छाप गुंडे घूमते थे। भाजपा के ये तमाम नेता अयोध्या के राम मंदिर के बाद मथुरा और काशी की तैयारी की बात तो कर ही रहे हैं। गुरुवार को मुरादाबाद में गृहमंत्री अमित शाह ने सपा के शासन में बाहुबली और भाजपा के शासन में बजरंगबली दिखाई देने की बात की। अमित शाह ने सभा में मौजूद लोगों को निजाम का नया मतलब भी समझाया और कहा कि निजाम का मतलब शासन होता है, मगर अखिलेश के निजाम का मतलब-नसीमुद्दीन, इमरान, आजम और मुख्तार था। आपको ये वाला निजाम चाहिए, या योगी-मोदी जी का सुशासन चाहिए। पिछले चुनावों में भी अमित शाह ने इसी तरह कसाब का नया मतलब समझाया था। चुनाव से पहले भाजपा अक्सर इसी तरह की सांप्रदायिक और धार्मिक भावनाएं भड़काने वाली बयानबाजी करती है। भाजपा जानती है कि इस देश की जनता को भावनाओं के ज्वार में कैसे बहाया जा सकता है। इसलिए कभी राष्ट्रवाद, कभी राम, कभी धर्म की रक्षा के नाम पर लोगों को प्रभावित करने की कोशिश होती है। संसद में 2 सीटों से बहुमत तक का सफर भाजपा ने इसी तरह तय किया है और अफसोस की बात ये है कि धर्म की इस उन्मादी राजनीति में बाकी दल भी कभी न कभी आ ही जाते हैं। अब तो धर्म के नाम पर संसद भी लगने लगी है, जहां धर्म की रक्षा के नाम पर तमाम तरह की अनर्गल बातें हो रही हैं। हरिद्वार की धर्म संसद में जिस तरह अल्पसंख्यकों के लिए नफरत भरे बयान दिए गए, उनसे जाहिर होता है कि बिना सत्ता के संरक्षण के, इस तरह की बातें सार्वजनिक मंचों से नहीं हो सकती। हरिद्वार के बाद रायपुर की धर्म संसद में भी ऐसी ही धार्मिक उन्माद से भरी बातें की गईं, बल्कि गांधीजी को कालीचरण नाम के तथाकथित संत ने अपशब्द कहे।

इस घटना के बाद कांग्रेस सरकार से तत्काल सख्त कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही थी। कालीचरण के खिलाफ मामला तो तुरंत ही दर्ज हो गया था। धर्म संसद के आयोजक महंत रामसुंदर दास ने भी बयान की आलोचना करते हुए खुद को धर्म संसद से अलग कर लिया था। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कालीचरण से आत्मसमर्पण की बात कही थी। और अब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मध्यप्रदेश से कालीचरण को गिरफ्तार किया है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति शुरु हो गई है। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इस गिरफ्तारी को लेकर संघीय ढांचे की व्यवस्थाओं और मर्यादाओं का उल्लंघन का सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस चाहती तो नोटिस देकर उन्हें ले जा सकती थी। मध्य प्रदेश की पुलिस से मदद मांगकर भी उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता था।

कितने आश्चर्य की बात है कि जब मध्यप्रदेश के ग्वालियर में गोडसे की मूर्ति पूजा होती है, जब गांधीजी की फोटो पर बंदूक चलाई जाती है, जब गोडसे को महान बताने वाली प्रज्ञा ठाकुर को भाजपा अपना प्रत्याशी बनाती है, जब बापू को कोई साधु कहलाने वाला शख्स अपशब्द कहता है, तब मर्यादाओं का ख्याल नहीं आता। लेकिन किसी आरोपी की गिरफ्तारी पर सारे कायदे याद आ जाते हैं। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री ने कहा कि कालीचरण जी ने जो बोला वह आपत्तिजनक था, जिस तरह से छत्तीसगढ़ पुलिस ने गिरफ्तारी की है वह भी आपत्तिजनक है। अब श्री मिश्रा को ये भी बता देना चाहिए कि अगर कालीचरण ने जो कहा वह आपत्तिजनक था, तो इस पर उन्होंने आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई। कैसे कालीचरण उनके शासन में उनके राज्य में आजाद घूम रहा था।

कालीचरण की गिरफ्तारी से लेकर उप्र की चुनावी रैलियों तक भाजपा नेता जिस तरह की बातें कह रहे हैं, उनसे उनकी असली मानसिकता का पता चल रहा है।