का दो फेरू महाभारत होई

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

पांच हजारों साल पहले भारत में महा युद्ध हुआ था जिसे हम महाभारत के नाम से जानते हैं l इस महा युद्ध में भीषण नरसंहार हुआ थाlकुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि लाशों से पट गई थीlऐसा कहा जाता है वहां की मिट्टीआजभी लाल रंग लिए हुए हैlयुद्ध तो पहले भी हुआ करते थे और आज भी होते रहे हैं lलेकिन इन युद्धों को महाभारत युद्ध की संज्ञा से विभूषित नहीं किया गया हैlवह युद्ध राज सत्ता की बंटवारे का युद्ध था।दोभाइयों के बीच का युद्ध थाlवह युद्ध सामंतों का राजाओं-महाराजाओं का युद्ध था। 

वह समय बदल चुका हैlयुद्ध की रणनीति में बहुत बदलाव आ गया हैlइस बात को कहने में संकोच नहीं है की उन दिनों नए टेक्नोलॉजी का विकास इस रूप में नहीं हुआ था जिस रूप में होना चाहिएlयह बात जरूर है कि दिव्य अस्त्रों का प्रयोग का जिक्र जरूर मिलता हैl घोर साधना के बल पर दिव्य अस्त्र लोग प्राप्त कर लिया करते थेlआज नोट के बल पर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है।नोट है तो कार्यकर्ता मिल जाते हैंlनोट है तो दलाल भी मिल जाते हैंlनोट है तो वह सब कुछ मिल जाता है जो नई मिलना चाहिए l

      एक बहुत बड़ा जमात है जो झूठ के आगे पीछे आंख मूंदकर दौड़ते चलता है।यह सब होता है लोकतांत्रिक व्यवस्था की सत्ता संघर्ष मेंlयही सत्ता संघर्ष तत्कालीन राज्य व्यवस्था में महाभारत का रूप धारण किए हुए हैंlचुनाव मैदान में जब भारी भरकम तरकस में तीर कमान लेकर नोटों के सौदागर मैदान में उतरते हैं कुर्सी दखल करने के लिए तब होता है महाभारतl पहले के महाभारत में राजाओं को निमंत्रण पत्र भेजा जाता थाl आज के महाभारत में जाति धर्म मजहबी जमात को दावत कार्ड भेजा जाता है और उन्हें आदर के साथ समारोहों में शामिल किया जाता हैlवह इसलिए किया जाता है कि एक टुकड़ा वोट की कागज अपने हाथ में रखने का पावर रखते हैं lयही पावर सत्ता संघर्ष और महाभारत का कारणहै।यही पावर धारी लोग अपने-अपने पार्टी के पक्ष में उम्मीदवारों के पक्ष में गोला बारूद चलाने का रिहर्सल करते हैंlलोकतांत्रिक व्यवस्था का चरित्र बदलने का काम करते हैंlलोकतंत्र में विश्वास रखने वाले सज्जन लोगअब चुनाव की देहरी पर पैर नहीं रख सकते हैंlअब तो लोकतंत्र उनके हाथ का झुनझुना बन गया है जो लोकतंत्र,संविधानऔरअन्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के पाठ पूजा को अपने कब्जे में कर रखे हैंl

            यह मुझ जैसे व्यक्ति को कहना नहीं चाहिए लेकिन जो कुछ होता है उसे देख कर कष्ट होता है की यही लोकतंत्र हैl लोकतांत्रिक व्यवस्था का यही स्वरूप है ?लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता हैlकिसी के मान-सम्मान पर चोट क्यों न  पहुंचे lजो कुछ लोकतंत्र के नाम पर नाटक किया जाता है उसे देख-सुनकर देश का बहुत बड़ा बुद्धिजीवी तबका दुखी हैlचिंतित हैlदेश के चालबाज नेता देश को किस ओर ले जा रहे हैं?

"का दो फिर महाभारत होई"इस कथन के गर्भ में बहुत कुछ छिपा हुआ है जो दिशा संकेत दे रहा है महाभारत का l

अरविंद विद्रोही