मानवीय दायित्व का आभास करवाती है मकर संक्रांति

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रान्ति कहा जाता है। इस शुभ दिन को देश के अनेक हिस्सों में एक नई शुरुआत के रूप में देखा जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार,मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिए गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवता पृथ्वी पर आते हैं। इसीलिए इसे देवताओं का समय, दिव्यता का समय माना जाता है। त्योहारों के बारे में हमेशा कुछ ऐसा होता है, जो खूबसूरत ही होता है। वास्तव में, भारतीय त्योहारों में कहीं न कहीं गहरा संदेश और अनुष्ठानों में अनोखापन होता है। हर पर्व-त्योहार और अनुष्ठान उन दिव्य गुणों की पहचान है, जो हमारे अंदर भी निहित होते हैं।

दिवाली जैसे हमारे अंदर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्रकाश से हमारा पुनर्मिलन करवाती है, उसी तरह मकर संक्रान्ति हमारी दिव्य विरासत से हमें रूबरू करवाती है, जो हमारे चारों ओर बिखरी है और इसे सभी के साथ साझा करने के मानवीय दायित्व का भी आभास करवाती है।

मकर संक्रान्ति प्रारंभ होती है, हमारी पहली फसल के लेने और उसे सब में बांटने से। कठिन मेहनत और उसके बाद उसके फल को प्राप्त कर उसे आपस में बांटने के लिए उत्सव मनाया जाता है। गांवों में, पहली गन्ने की फसल, पहली चावल की खेप दिव्यता को समर्पित करते हैं और आपस में भी बांटते हैं। तभी किसान अपनी पूरी फसल अपने लिए प्रयोग में लाता है।

संक्रान्ति का मूल भाव ही बांटने की संस्कृति का होता है और यह सिर्फ फसल तक ही सीमित नहीं होता है। त्योहार हमें यह भी याद दिलाते हैं कि इस दिव्य विरासत को हम उन लोगों में भी बांटें, जो अपेक्षाकृत कम भाग्यशाली हैं, जो त्योहार नहीं मना पा रहे हों। संक्रान्ति के साथ एक और परम्परा जुड़ी हुई है कि इस दिन गुड़-तिल बांटे जाते हैं। इसके पीछे भी बहुत बड़ा संदेश है। तिल जहां हमारे अस्तित्व की सहजता को दर्शाता है, वहीं गुड़ दुनिया की सारी मिठास को। इस प्रतीकात्मक तथ्य के पीछे उद्देश्य ही यह है कि सबके पास यह आशीर्वाद हो कि वे सहज, सामान्य, अहंकार रहित हों और हमेशा मीठा ही बोलें। हम तिल की तरह हैं। हमारा इस ब्रह्मांड में होने का महत्व क्या है? जीवन क्या है? हमारा जीवन छोटे से तिल के समान है, एक कण! देखा जाए तो कुछ नहीं।

तिल बाहर से काला होता है और अंदर से सफेद। यह दर्शाता है कि हमें अपना अंदर उजला यानि शुद्ध रखना है। यदि आप तिल को थोड़ा-सा रगड़ें, तो वह बाहर भी सफेद हो जाता है, अर्थ यही है कि हम जब हमारे बाहरी आवरण उतार देते हैं, तो पाते हैं कि हम अंदर से उतने ही पवित्र हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि हम सहज, सामान्य और मीठे हैं, ठीक उसी तरह जैसे तिल और गुड़ हैं। जब भी कोई खुद को बहुत बड़ा मानने लगता है, तो उसका पतन प्रारम्भ हो जाता है। यह एक प्रयोगवादी सत्य है। हम अपने आसपास कई लोगों को देखते हैं। जैसे ही हमारे अंदर अकड़ आती है कि मैं कुछ हूं, वैसे ही पतन की शुरुआत हो जाती है। मैं शक्तिशाली हूं और हमारी शक्तियां भी क्षीण होने लगती हैं। इसको जानना ही हमें पतन से रोक देता है और यह सिर्फ अध्यात्म की ही देन है।

वर्ष भर में 12 संक्रान्तियां होती हैं, जिसमें से मकर संक्रान्ति को सबसे महत्त्वपूर्ण माना गया है। जब सूर्य मकर राशि में आते हैं और जाड़े के मौसम की विदाई की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जाड़े की तीव्रता के बाद सूर्य की रश्मियां सुखकारी होती हैं। यह वह समय है, जब हम बीज बोते हैं और उस बीजारोपण के साथनई फसल की भूमिका रखते हैं।

मकर संक्रान्ति का महत्त्व होता है कि सूर्यदेव उत्तरायण हो जाते हैं, वह उत्तर की ओर होने लगते हैं। इसे उत्तरायण पुण्य काल कहा जाता है, जो देवताओं का समय है, दिव्यता का समय है। यह सही है कि पूरा साल ही वैसे तो दिव्य है, लेकिन इस समय को थोड़ा और अधिक दिव्य माना जाता है। इसके बाद ही सारे त्योहार प्रारम्भ होते हैं।

साल में दो दिन होते हैं, जब कोई भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा की प्रगति का मूल्यांकन कर सकता है। एक है मकर संक्रान्ति और दूसरा गुरु पूर्णिमा। यह दोनों आपस में भी लगभग आधे-आधे साल के अंतर में ही आते हैं। इस मौके को तुरंत भुनाइये और अपने नवीन संकल्प इस दिन से प्रारंभ करिए। जब आप इस अध्यात्म के रास्ते पर आ जाते हैं, तब आपके लिए कोई वर्ष, कोई दिन या कोई पल ऐसा नहीं होता है कि वह दिव्य न हो। मकर संक्रान्ति पर उस दिव्यता से सम्पर्क को महसूस करें और दृढ़ता के साथ आगे बढे।