॥ जिन्दगी के खेल निराले ॥

जिन्दगी तेरे खेल हैं अति निराले

कभी दिखे लाल कभी मुँह काले

सुख दुःख की जहाँ दरिया है बहती

कभी तूँ रूलाती कभी तूँ हॅसाती


जिन्दगी तेरे खेल हैं अति निराले

कभी पेट भरता कभी पड़े   लाले

कोई जग में बन जाता है बड़ी हस्ती

कभी निर्धन की लुट जाती है बस्ती


जिन्दगी तेरे खेल हैं अति निराले

कभी भरता झोली कभी  दिवाले

कभी दिल का बन जाता समन्दर

कभी डुबा देता है तुँ बन कलन्दर


जिन्दगी तेरे खेल हैं अति निराले

कभी देता है खुशियाँ कभी गम प्याले

हर कोई इस जग में है यहाँ रोता

कोई महलों में कोई फुटपाथ पे सोता


जिन्दगी तेरे खेल हैं अति निराले

कभी तकदीर पर लगा जाते हो ताले

कोई भी शख्स यहाँ नहीं है  अपना

मानवता बन गया है दिवा सपना


जिन्दगी तेरे खेल अति हैं निराले

प्रेम मोहब्बत सब बह गये  नाले

जग पर भरोसा की खो गई   ताली

ईष्या द्वेष बनी जग में अब होली


उदय किशाेर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

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