रे मानव

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

गुजर रही थी मैं 

एक पर्वत के पास से 

काटकर बनाई गई सड़क से 

इस पार से उस पार से 

अचानक पर्वत मुझसे यूं बोला

 क्यों मुझे काटकर तुमने 

मेरी सुंदरता से खेला 

ऊपर विशाल में अटल  खड़ा था 

ऊंचे ऊंचे शिखरों संग नभ को छू रहा था 

हरियाली थी मेरे चारों और अपार

 काटकर बनाए जिसे 

तुम ने सड़क आरपार 

कितने पंछियों के घरोंदे

तुमने तोड़े

पुत्र से मेरे पेड़ों को 

मुझसे तुमने छीने 

अपनी सुविधाओं के लिए

 किया तुमने मुझ पर अत्याचार 

अपनी सहूलियत के लिए तुम

 प्रकृति को छेड़ते हो 

विशाल नगों को काटते हो

 नदियों को रोकते हो 

समुद्र पर भी करते हो तुम परीक्षण हजार

 दोष हमें ही देते फिर 

क्यों तुम बार-बार 

विधाता किस सृष्टि में 

सबका हक एक बराबर था 

तुमने सब पर हक जता किया 

सब पर कुठाराघात 

रे मानव तू तो निकला 

बड़ा ही खात बड़ा ही खात।

गरिमा राकेश गौतम

कोटा राजस्थान