आखिर भाजपा की खुशी का राज क्या है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

बमुश्किल छह माह पहले बंगाल के विधानसभा के चुनाव में भाजपा को बुरी तरह शिकस्त देने वाली तृणमूल कांग्रेस, जिसने समूचे विपक्ष को भी नई ऊर्जा से भर दिया था और भाजपा के खिलाफ शेष मुल्क में बंगाल अनुभव दोहराने की बात की थी, क्या फिलवक्त भाजपा के खिले चेहरे का सबब बन गई है ? तीन काले कृषि  कानूनों और न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा अन्य मांगों को लेकर एक साल से अधिक वक्घ्त से जारी किसान आंदोलन के समक्ष झुकने के लिए मजबूर और काले कानूनों की वापसी के लिए अब तैयार भाजपा के लिए संसद का शीत सत्र का यह अधिवेशन निश्चित ही अधिक चुनौतियों के साथ उपस्थित है और ऐसे समय विपक्ष की एक अहम पार्टी तृणमूल की एक साझा एजेंडा तय करने को लेकर चली आ रही अस्पष्टता निश्चित ही विचारणीय है।

ध्यान रहे चंद महिनों के अंदर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 2014 में सत्तारोहण के बाद भाजपा के लिए यह पहला अवसर है कि वह किसानों के व्यापक जनान्दोलन एवं बढ़ते असंतोष के चलते बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर हुई है, उसे यह भी मालूम है कि इतने कम समय में वह अपने चिरपरिचित ध्रुवीकरण के एजेंडा को वह आगे नहीं बढ़ा सकती है और इसलिए वह काफी मुश्किल में भी है। बकौल अमित शाह 2022 के चुनावों में योगी की हार जीत 2024 में मोदी सरकार की हार-जीत का भविष्य तय करने वाली है। वैसे जानकार लोग बता सकते हैं कि जितनी तेजी से घटनाक्रम बदल रहा था, उसके चलते उन्होंने इस बात के पूरे कयास लगाए थे कि शीतसत्र में क्या होने वाला है? 

चार माह के अंतराल में सुश्री ममता बैनर्जी, की दिल्ली की दो यात्राओं ने ही स्थिति स्पष्ट कर दी थी। दिल्ली की उनकी हालिया यात्रा की खासियत थी प्रधानमंत्री मोदी से उनकी मुलाकात - जो कथित तौर पर राज्य से जुड़ी चंद मांगों के लिए थी, जिसमें उन्होंने सीमा सुरक्षा बलों की राज्य में तैनाती के मसले को उठाया तथा केन्द्र के पास राज्य के आपदा राहत को लेकर कुछ हजार करोड़ रुपए पड़े हैं, उनकी मांग कीय इतना ही नहीं उन्होंने अगले साल कोलकाता में आयोजित ग्लोबल बिजनेस सम्मिट में भाग लेने के लिए भी उन्हें न्यौता दिया। गौरतलब था कि कांग्रेस अध्यक्ष सुश्री सोनिया गांधी से उनकी प्रस्तावित मुलाकात हो नहीं पाई जिसके बारे में न केवल मीडिया में खबरे छपी थीं बल्कि उनके चंद पार्टी नेताओं ने भी संकेत दिया था। 

दिल्ली में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में जब किसी पत्रकार ने उनसे जानना चाहा कि क्या वह सुश्री सोनिया गांधी से मिलने वाली हैं, तो उन्होंने लगभग खारिज करने के अंदाज में कहा कि श्बार-बार किसी को मिलने की क्या जरूरत है? अगर हम याद करें तो अपनी पार्टी की ऐतिहासिक जीत के- जब उन्होंने मोदी-शाह एवं उनकी पूरी मशीनरी को जबरदस्त शिकस्त दी थी- महज दो माह बाद दिल्ली की उनकी यात्राध् जुलाई 2021ध् बिल्कुल अलग अंदाज में संपन्न हुई थी। इस दौरान न केवल उन्होंने विपक्ष के तमाम नेताओं से मुलाकात की थी बल्कि वह निजी तौर पर कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिलने गईं थीं, जहां राहुल गांधी भी मौजूद थे। 

आपसी बातचीत में उनका जोर श्विपक्ष की एकता को कैसे मजबूत किया जाएश् इसी पर था। विपक्षी पार्टियों में ही नहीं सिविल सोसायटी संगठनों में इस बात को लेकर भी उत्साह था कि उन दिनों पेगासस का मामला सुर्खियों में था, न केवल संसद में उस पर चर्चा हो रही थी बल्कि सर्वोच्च न्यायालय भी उस पर गौर कर रहा था, और ममता बैनर्जी की सरकार ने पेगासस की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश,रिटायर्ड, मदन लोकुर की अगुवाई में एक कमीशन पहले ही बिठाया था। क्या यह कहना मुनासिब होगा कि वह दौर अब समाप्त हुआ है! इस बदले परिदृश्य को लेकर- विगत चार माह में क्या हुआ- इसके बारे में महज अंदाज ही लगाया जा सकता है। 

लोकतंत्र में हर पार्टी को अपने आप को मजबूत करने का अधिकार होता है और फिर तृणमूल के इस प्रयास पर किसे एतराज हो सकता था, लेकिन अपने आप को मजबूत करने की इस प्रक्रिया में तृणमूल के निशाने पर कांग्रेस थी। त्रिपुरा में कांग्रेस समर्थकों, कार्यकर्ताओं एक हिस्से को अपने पक्ष में करने के बाद, उत्तर पूर्व पर अपना ध्यान केंद्रित करतेे हुए तृणमूल का विस्तार का प्रोजेक्ट कांग्रेस के चंद युवा एवं वरिष्ठ नेताओं को- भले ही उनकी अधिक संख्या न हो- अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रहा था। असम की सुष्मिता देव, जो खुद महिला कांग्रेस की अध्यक्ष थीं- द्वारा तृणमूल से जुड़ना निश्चित ही कांग्रेस के लिए एक झटके की तरह था, उसके बाद गोवा के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता- जो पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं - ने तृणमूल के पक्ष में अपना पाला बदला। 

अभी भी यह सिलसिला जारी है, अशोक तंवर हरियाणा, कीर्ति आजाद, बिहार के तृणमूल से जुड़ने के बाद उत्तरी पूर्व के मेघालय में 18 कांग्रेस विधायकों में से 13 का पार्टी छोड़ कर तृणमूल से जुड़ना कम झटका नहीं है। सवाल उठता है कि इन बदली प्राथमिकताओं के पीछे का सत्य क्या है? औपचारिक तौर पर तृणमूल की तरफ से यही दावा किया जा रहा है कि श्कांग्रेस भाजपा से लड़ने को लेकर गंभीर नहीं है या किस तरह दो चुनावों में (2014 एवं 2019) वह भाजपा को शिकस्त देने में असफल हुई है और इसके बरअक्स बंगाल का अनुभव है, जिसमें भाजपा को शिकस्त मिली थी। टीएमसी के मुखपत्र जागो बांगला में अपने आलेख देल्लीर डाक, दिल्ली बुला रही हैॅ, में खुद ममता बैनर्जी ने इसी स्थिति की चर्चा की थी।

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो बिल्कुल साफ  है कि पार्टी के इस मिशन इंडिया प्रोजेक्ट में चुनाव रणनीतिज्ञ प्रशांत किशोर का पार्टी के अंदर बढ़ता प्रभाव साफ दिखता है। यहां इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि पहले खुद प्रशांत किशोर के ही कांग्रेस पार्टी में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। दोनों तरफ से औपचारिक तौर पर कुछ कहा नहीं गया था, लेकिन लखीमपुरी खीरी मामले में प्रियंका गांधी ने जो हस्तक्षेप कियाय इस मामले में एक तीखी टिप्पणी प्रशांत किशोर ने की थी और कांग्रेस को यह बिन मांगी सलाह ही दे डाली थी कि ऐसी प्रतीकात्मक कार्रवाइयों से इस ग्रंड ओल्ड पार्टीश् को अधिक कुछ नहीं मिलेगा। 

यह बात दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि तृणमूल की इन बदली प्राथमिकताओं एवं ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी एवं उनकी पत्नी की बढ़ती मुश्किलों के अंतर्सम्बंध पर भी सोचने की जरूरत है। याद रहे कि बंगाल चुनावों के पहले सीबीआई ने अभिषेक एवं उनकी पत्नी को पश्चिम बरद्वान जिले में कोयला चोरी के मामले में जांच के सिलसिले में समन भेजा था, जिस मामले में कुछ अभियुक्त जेल में है। इसे लेकर अभिषेक एवं उनकी पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। चुनावों के बाद इसी मामले को लेकर एन्फोर्समेण्ट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने उन्हें समन भेजा। मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सितंबर माह की शुरुआत में अभिेषेक ईडी के सामने हाजिर भी हुए थे। 

आप इसे महज संयोग भी कह सकते हैं कि विगत दो माह से इस मामले में आगे की कार्रवाई नहीं हुई है, जब से तृणमूल द्वारा राष्ट्रीय राजनीति में पैर पसारने की कोशिशें तेज हुई हैैं। इस समूचे मामले में अर्थात विपक्ष के बीच आई दरार का मामला कैसे सुलटेगा यह कहना मुश्किल है! मुमकिन है कि आपसी विवादों को भूल कर विपक्ष की पार्टियां साझा रणनीति बनाने के बारे में सोचें और इस बारे में रास्ता तय करें। बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष की बड़ी छोटी सभी पार्टियां भाजपा जिस बहुसंख्यकवादी जनतंत्र की राह मजबूत कर रही है, उस खतरे के बारे में पूरी तरह सचेत हैं या नहीं? 

क्या वह यह समझती हैं कि यह महज चुनावी मामला नहीं है, भाजपा अपने समाज की विभिन्न दरारों को- धर्म एवं आस्था के नाम पर बनी- अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में तथा अपने पक्ष में बहुसंख्यक समुदाय के बड़े हिस्से को या मुखर हिस्से को करने में कामयाब हुई है और उसके खिलाफ एक मजबूत चुनौती पेश करना, एक लंबे संघर्ष की मांग करता है। याद रहे कि मशहूर श्रीलंकाई विद्वान स्टेनले तमबैया ने अपने मुल्क में सिंहली अंधराष्ट्रवाद तथा उसकी प्रतिक्रिया को लेकर एक दिलचस्प बात कही थी, उन्होंने कहा था कि सिंहली लोग एक ऐसी बहुसंख्या है जो अल्पसंख्यक मनोग्रंथि से ग्रस्त हैं। क्या यह समझदारी भारत के अनुभवों पर भी सटीक बैठती है, जहां हम पाते हैं कि बहुसंख्यक समुदाय का प्रभुत्व चौतरफा है, इसके बावजूद वह यही सोचता है कि वह उत्पीड़न का शिकार है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि असमावेशी हिन्दुत्व वर्चस्ववादी राजनीति का उभार इस मनोग्रंथि को और मजबूत करता है। हम चाहें न चाहें लेकिन संविधान के मूल्य और सिद्धांतों को बचाने का संघर्ष-जो एक तरह से बहुसंख्यकवाद के प्रोजेक्ट की काट हो सकता है-आज हमारे सामने है, जिसके लिए एक लंबे संघर्ष की आवश्यकता है। और वे सभी जो संविधान में यकीन रखते हैं और भारत को हिन्दु राष्ट्र बनने नहीं देना चाहते हैं, उनका साथ जुड़ना समय की मांग हैै।