इतनी बड़ी रैली के बाद भी वही सवाल कि कांग्रेस करती क्या है?

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

इस समय की दो सबसे ज्यादा टकराने वाली विचारधाराओं के पास प्रकाशन सबसे बड़ी ताकत है। इनमें एक सामाजिक यथास्थितिवाद की पक्षधर संघ है। जिसके  पास अब अपने अखबार, पत्रिकाओं के अलावा सोशल मीडिया भी है। तो दूसरी तरह सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाली बिखरी-बिखरी ताकतें भी छपे हुए अक्षर का महत्व जानती हैं। आरजेडी अपना अखबार निकालती है जिसमें अच्छा संपादक भी होता है। बिहार में जातीय जनगणना करवाना इनकी बड़ी सफलता है। दूसरी तरफ दलित ताकतें लघु पत्रिकाओं और छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से दलित अधिकारों का बड़ा काम कर रही हैं।

बंतनी विशाल रैली के बाद भी वही सवाल कि कांग्रेस कुछ करती क्यों नहीं? मीडिया भीड़ को नहीं दिखा रहा। राहुल ने यह क्यों कहा? यह क्यों नहीं कहा पर डिबेट कर रहा है। भीड़ को देखकर मीडिया घबरा गया। मोदी जी को तो पता था इसीलिए दिल्ली में नहीं करने दी। मगर अपने झूठे प्रचार पर खुद भी यकीन कर लेने वाला मीडिया कांग्रेस का यह मेगा शो देखकर हिल गया। रैली का असर कम करने के लिए उसने फिर अपना वही पुराना राग छेड़ दिया कि विपक्ष में कांग्रेस कुछ नहीं करती। कांग्रेस कुछ भी कर ले मगर वह न मीडिया को दिखाई देगा और न ही इस तरह के सवाल करने वालों को। किसान आंदोलन में राहुल गांधी सबसे ज्यादा सक्रिय रहे मगर मीडिया इस बात का जिक्र कहीं नहीं करता है। 

उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ भाजपा, कांग्रेस को सबसे बड़ा विरोधी मान रही सपा किसी से भी आप बात कर लो बिना प्रियंका के उनकी बात पूरी नहीं होती। प्रियंका के खिलाफ बोलते हैं, देर से यूपी आई बोलते हैं मगर सब यह मानते हैं कि राज्य में उनसे ज्यादा सक्रिय कोई नहीं है। जहां भी कोई अन्याय, अत्याचार हुआ प्रियंका वहां पहुंचीं। पीड़ितों के साथ खड़ी हुईं। मगर यह सब मानेंगे प्राइवेट में। सार्वजनिक रूप से वही क्या खुद कांग्रेस के लोग भी कह रहे हैं कि यूपी में कांग्रेस है कहां? प्रियंका है मगर कांग्रेस नहीं है! गजब। यह तो कबीर की उलटबांसी हो गई। श्बिन पवन सो पर्वत उड़े, जीव जन्तु सब वृक्ष चढ़े! बिना हवा के चर्चा क्यों? मगर यही हो रहा है। श्देखि- देखि जिय अचरज होई यह पद बुझे बिरला कोई। अब कौन है यह बूझने वाला? न मीडिया, न राजनीतिक दल। बस जनता है। 

अगर उस तक बात पहुंचा दी जाए तो उसे बूझने में देर नहीं लगती। बस यही रोकने के लिए पूरी ताकत लगी हुई है। प्रचार के हर माध्यम पर नियंत्रण कर लिया गया है। इसीलिए रविवार को कांग्रेस की इतनी बड़ी रैली होती है और सोमवार को फिर वही सवाल हर जगह दिखता है कि महंगाई के लिए कांग्रेस क्या कर रही? इसका क्या मतलब? यह कि कांग्रेस महंगाई खत्म कर दे। कोरोना की दूसरी लहर के समय जब सरकार असहाय हो गई थी तो मीडिया की डिबेटों में यही कहा जा रहा था कि विपक्ष क्या कर रहा है? राहुल गांधी जो फरवरी 2000 से इसकी चेतावनी दे रहे थे उसे तो अनसुनी किया। या मजाक उड़ाया मगर जब कोरोना ने तांडव मचाया तो भाजपा सहित मीडिया एक ही बात कर रहा था कि, तो कांग्रेस कहां है? मतलब सरकार नहीं है। व्यवस्थाएं फेल हो गईं। सब ठीक है। मगर कांग्रेस क्या कर रही है? 

ऐसे ही जनता के बीच जब महंगाई का सवाल ज्यादा उठने लगा तो पूछते हैं, कांग्रेस कहां है? कांग्रेस को इसका हल ढूंढना होगा। गलत सवाल है। गलत आदमी से पूछा जा रहा है। गलत पार्टी से पूछा जा रहा है। मगर पूछा जा रहा है। जोर-शोर से पूछा जा रहा है। चारों तरफ इसी की गूंज है। नक्कारखाना बना दिया गया है। दो-चार अखबार जिनकी पहुंच भी कमजोर कर दी गई है वे तूती की आवाज बन गए हैं। कहां सुनाई देगी! सोशल मीडिया का भ्रम है। जितना सच यहां बड़ी मेहनत से लाया जाता है उससे कई हजार गुना ज्यादा झूठ यहां फैला हुआ है। और फिर सोशल मीडिया के प्लेटफार्म फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर सब सरकार से डरे हुए हैं। कई बार साबित हो चुका है। प्रमाण आ गए हैं कि ये मीडिया साम्प्रदायिकता, झूठ और नफरत फैलाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं। इनके जरिए कुछ नहीं किया जा सकता। यह कभी-कभी थोड़ा बहुत स्पेस देकर यह भ्रम बना देते है कि यह एक निष्पक्ष और स्वतंत्र मंच है। मगर वह झूठा भरम है। एक छोटे सच के बहाने वे हजार बड़े झूठ फैलाते हैं। 

आम लोगों को जोड़े रखने के लिए सच की छुटपुट खबरें चलने देते हैं। मगर जैसा कि भीड़ जब चोर है, चोर है का शोर मचाती है तो मनमोहन सिंह जैसा ईमानदार प्रधानमंत्री भी शक के दायरे में आ जाता है। बाद में चाहे सीएजी विनोद राय अदालत में एफिडेविड देकर माफी मांग ले मगर उससे क्या होता है! यह माफी तो अभी मांगी। मगर इससे पहले इस नरेटिव का फायदा उठाते हुए सीबीआई तो पहले ही मनमोहन सिंह के यहां भेज दी गई थी। मगर कांग्रेस के बाकी बड़े नेताओं की तरह वे डरे नहीं। खुद को उनसे काबिल मानने वाले कांग्रेस द्वारा राष्ट्रपति तक बना दिए गए प्रणव मुखर्जी से लेकर बाकी उनके मंत्रिमंडल के कितने वरिष्ठ मंत्री, संगठन के पदाधिकारी, मुख्यमंत्री संघ और प्रधानमंत्री मोदी के सामने शरणागत हो गए। जबकि मजेदार बात यह है कि मनमोहन सिंह को सबसे कमजोर कड़ी माना जा रहा था। 

2014 में सत्ता जाने के बाद लग रहा था कि मनमोहन की चूंकि राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं है इसलिए वे सबसे पहले टूटेंगे। मगर सरदार जी वाकई किसी दूसरी मिट्टी के बने हुए थे। न कांग्रेस और न ही नेहरू-गांधी परिवार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में जरा भी फर्क आया। दुबले -पतले, कम बोलने वाले मगर असली फौलादी चरित्र वाले तो वही निकले। सब हिल गए मगर सरदार जी डटे हैं। खुद उनकी ही बात आज जमाना याद कर रहा है। कहा था समय मेरे साथ बेहतर न्याय करेगा। और वाकई जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है उनके द्वारा भारत में लाई गई आर्थिक समृद्धि, मध्यम वर्ग के लिए नौकरियों की बहार, बाजार की रौनक सब और ज्यादा याद किया जा रहा है। 

मगर कांग्रेस न तो उस समय का विकास जो कि असली था का प्रचार कर पाई और न ही अभी के नकली विकास की कहानियों, सरकारी संपत्ति बेचने के असली मामलों, नफरत और विभाजन की राजनीति से देश को खोखला करने के भयानक परिणामों को लोगों को बता पा रही है। इन सात सालों ने बता दिया कि प्रचार कितनी ताकतवर चीज होती है। नकली छवि का प्रभाव यह होता है कि कह दिया गया कि देश को असली आजादी 2014 में मिली। इन सात सालों में कही सबसे मौलिक बात यही है। बाकी नेहरू ने कुछ नहीं किया, आजादी 99 साल के पट्टे पर मिली, भारतीयों की विदेशों में कोई इज्जत नहीं है, वगैरह सारी बातें संघ के प्रचार में पहले से कही जाती रही हैं। बस फर्क यह है कि वे एक सीमित दायरे में होती थीं। अब अनुकूल अवसर पाकर सार्वजनिक रूप से की जाने लगीं। तो अब कांग्रेस क्या करे। रैली भी कर ली। हजारों लोग इकटठा कर लिए मगर मीडिया तो न दिखाता है न बताता है। फिर? कांग्रेस को अपना प्रचारतंत्र मजबूत करना पड़ेगा।

 लोकतंत्र में विपक्ष की बात का अनसुना रहना बहुत घातक होता है। आज सरकार के मद का सबसे बड़ा कारण ही यही है कि लोग कुछ नहीं जानते। किसान जानते थे।  तो उनकी जीत हुई। वे विजयी सेना की तरह शान से गांवों को जा रहे हैं। विपक्ष में प्रचार के मामले में कांग्रेस ही सबसे ज्यादा कमजोर है। आज जिन पार्टियों टीएमसी, शिवसेना की सबसे ज्यादा बात हो रही है। उनके अखबारों की संपादकीय, विशेष लेखों की वजह से। कहने को कांग्रेस का भी अपना अखबार है। हिन्दी-अंग्रेजी दोनों में। पत्रिका भी है। मगर कोई कांग्रेसी भी इन्हें नहीं पढ़ता। और कांग्रेस के एक बड़े नेता ने कहा-इनमें होता क्या है?

 इनकी किसी रिपोर्ट के आधार पर हम आज तक एक प्रेस कान्फ्रेंस भी नहीं कर पाए। इस समय की दो सबसे ज्यादा टकराने वाली विचारधाराओं के पास प्रकाशन सबसे बड़ी ताकत है। इनमें एक सामाजिक यथास्थितिवाद की पक्षधर संघ है। जिसके  पास अब अपने अखबार, पत्रिकाओं के अलावा सोशल मीडिया भी है। तो दूसरी तरह सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाली बिखरी-बिखरी ताकतें भी छपे हुए अक्षर का महत्व जानती हैं। 

आरजेडी अपना अखबार निकालती है जिसमें अच्छा संपादक भी होता है। बिहार में जातीय जनगणना करवाना इनकी बड़ी सफलता है। दूसरी तरफ दलित ताकतें लघु पत्रिकाओं और छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से दलित अधिकारों का बड़ा काम कर रही हैं। कांग्रेस के पास ऐसी चार बुकलेट भी नहीं हैं जो बता सकें कि पिछले दो सालों में राहुल ने कोरोना, अर्थव्यवस्था में गिरावट, रोजगार, चीन की घुसपैठ, किसान, पैदल जाते मजदूर पर कितनी सही चेतावनियां दीं और कैसे वे सड़क पर संघर्ष करते रहे। मीडिया में और वहां से चलकर गली, मोहल्लों तक पहुंचने वाले झूठे सवालों के जवाब देने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के पास चार तथ्य भी नहीं होते। राहुल और प्रियंका चाहे जितना लड़ लें। पर्वत भी उड़ा दें। मगर लोग कहेंगे कि पर्वत था ही कहां? जंगल में मोर नाचा वाली स्थिति बना दी है। देखकर भी सब कहते हैं किसने देखा!