अपना एक घर

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  


बहुत आलीशान न भी हो,

मामूली-सी छत के नीचे हो

चाहे साधारण सा एक कमरा,

घांस-फूस से बनी झोंपड़ी हो

अथवा हो पॉलिथीन से बना

एक अस्थाई टेंट ही,

जिसमें इंतजार कर रहे हों

माता-पिता, भाई-बहन एवं

बीवी बच्चों में से कोई

या फिर इंतजार करती हों

उनकी यादें ही,

तो काम के बाद 

इंसान घर लौटता है जरूर

अपने अस्तित्व को महसूस करने।


जिसके पास नहीं कोई कारण

घर लौटने का

वो बंजारा हो जाता है भटकता दर-बदर,

बहुत जरूरी है इंसान के लिए

होना अपना एक घर।


                                 जितेन्द्र 'कबीर'