विवाह एक यज्ञ

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

विवाह के विषय में विवाहितों का तो मैं नहीं कह सकती क्यों कि सभी की राय एक दूसरे से जुदा होगी। लेकिन अविवाहितों के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तो आ ही जाती है। अब शादी के लड्डु जो खाये वो पछताये और जो ना खाये वह उससे ज्यादा पछताये।अजीब विधि की विडम्बना है। कुछ लोग सोचते हैं जब पछताना ही है तो खाकर ही क्यों ना पछताया जाये। शादी का लड्डु जीवन में खाना तो पड़ेगा ही इसीलिए खा कर ही पछताया जाये।यह बात दिगर है कि आजकल लिव-इन रिलेशनशिप का चलन भी आ गया है। अब तो महानगरों में स्थिति यह हो गई है कि लड़के लड़कियां शादी ही नहीं करऩा चाहते हैं। पटी तो बरसों नहीं पटी तो तरसो, विवाह के रिश्ते को चायना का माल समझ रखा है।हमारी भारतीय संस्कृति में वर्णित सोलह संस्क़ारों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण विवाह संस्कार है। विवाह स्त्री एवं पुरुष के संयुक्त रूप में जीवन को सुचारु रूप से आनन्द पूर्वक दुख-सुख में सहभागी बनते हुए एक सामाजिक व्यवस्था है। वर एवं वधू साथ रहते हुए सृष्टि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। और इसी योगदान की वजह से मनुष्य जीवन सार्थक होते हुए वह पितृ ऋण से भी मुक्त होता है। इसीलिए विवाह संस्कार व्यवहारिक एवं सामाजिक जीवन का आधार है। और यह उन दो अलग-अलग लोगों की जो अब एक हो चुके है , पहचान है।जन्म से लेकर मत्यु तक जीवन को सोलह संस्कारों से परिभाषित भी करा गया है। जीसमें विवाह संस्कार एक अतिमहत्वपूर्ण संस्कार होते हुए एक सामाजिक रस्म भी है। जिसमें अनगिनत शक्तियां निहित हैं।भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह एक संस्कार है। अनुबंध नहीं।अनुबंध तोड़े जा सकते हैं लेकिन संस्कार नहीं ऐसा मेरा मानना है। इसी आधार पर पति-पत्नी को अर्धांगिनी माना गया है। एवं अविवाहित स्त्री और पुरुष को अधूरा माना गया है। गृहस्थ जीवन की डोर विवाह संस्कार से जुड़ी हुई है। जिसका कि पूर्व में एवं वर्तमान तथा भविष्य में भी अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। पति - पत्नी में भावनात्मक जुडाव और स्नेह अत्यावश्यक है। जो साथ रहते- रहते आ ही जाता है। ऐसा कहा जाता है कि पति और पत्नी को आपस में प्यार करने के लिए किसी नाटक की जरूरत नहीं होती है। वह स्वाभाविक रूप से अपने आप हो ही जाता है। यह सात जन्मों का बन्धन होता है। विवाह का लक्ष्य संतान प्राप्ति भी है। और संतान के जीवन में आ जाने से जीवन में उत्साह ,उमंग एवं खुशी का वातावरण निर्मित होता है। क्यों कि विवाहित स्त्री पुरुष अपनी संतान को सामाजिक व्यवस्था से जोड़ते हैं। माता-पिता बच्चों को ऐसे संस्कारो से जोड़ते हुए संस्कारित करते हैं कि वह सभ्य एवं संस्कारवान बन एक सभ्य समाज का निर्माण करें। जिन घरों में बच्चे अपने बड़े बुजुर्गों की छात्र छांया में बड़े होते हैं वह घर स्वर्ग के समान होता है। आजकल संयुक्त रूप से अधिकांश लोग रहना ही नहीं चाहते हैं।चाहे वह बुजुर्ग हों या उनके विवाहित बच्चे सभी को अपनी स्वतंत्रता चाहिये साथ रहते हुए अक्सर यह संभव नहीं होता है। सभी को अपनी-अपनी आजादी चाहिये। आजकल बुजुर्गों को भी उनकी आजादी चाहिये ।कोई भी त्याग करना ही नहीं चाहता। फिर जब बच्चे माता-पिता को बुढ़ापे में रखना नहीं चाहते तो हम बच्चों को दोष देते हैं। दोष तो दोनों तरफ से है। क्योंकि दोनों नें अपनी अपनी आजादी चाही है।आजादी किसे नहीं चाहिये। और जब नहीं मिलती है तब परिवारों में कटु परिस्थितियां निर्मित होती हैं। कई बार घर में बुजुर्ग़ों को नज़रअंदाज भी करा जाता है और यहां तक की कुछ प्रकरणों में अपमानित भी किया जाता है। वहीं कई बार बहु को भी प्रताड़ित किया जाता है। वैवाहिक जीवन में हर कदम पर जगह-जगह चाहे ईच्छा हों या ना हो समझौता तो करना ही पड़ता है। नहीं तो परिवार बिखरते देर नहीं लगती। जीवन में कभी-कभी ऐसी परिस्थति भी निर्मित हो जाती है तब सुखी परिवार की परिकल्पना करना भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन फिर भी लोग विवाह करते हैं और विवाह का लड्डु जरूर खाते हैं। क्यों कि मानों या ना मानों लड्डु खाकर अच्छा तो लगता ही है। अब किसी को कम अच्छा तो वहीं किसी को बहुत अधिक अच्छा लगता है यह अपना - अपना भाग्य तथा आपके आसपास का वातावरण एवं आपकी व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करता है। विवाह के साथ अनुबंध शब्द नहीं जुड़ा है। हमारे यहां विवाह के साथ संस्कार शब्द जुड़ा है।जिससे इस रिश्ते की पवित्रता का भाव प्रकट होता है। 

इसका अर्थ है अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण निष्ठा,निष्कपटता, निश्छलता,प्रेमपूर्वक अपनेपन के साथ निर्वाह।विवाह एक यज्ञ की भांति है यहां अनेकों अवसरों पर पतिपत्नी दोनों को ही अपनी खुशीयों की आहूति देना पड़ती है। जब आहूति दे ही रहे हैं तो अपने अंदर की दुर्भावना,वैमनस्य एवं कटुवचनों की भी आहूति दे ही देना चाहिये। इस तरह की आहुति दे दो। कहना बहुत आसान है। लेकिन कहने में जाता ही क्या है।जब इंसान कहता है तो वह सोचता भी है। और जब सोचता है तो अक्सर कर ही लेता है। और अच्छा सोचने एवं करने में क्या बुराई है। स्वार्थ लोभ लालच मनुष्य को कठोर हृदय का स्वामी बना देते हैं। वर्तमान समय में परिवार टूट रहे हैं ।एकल परिवार का चलन बढ़ गया है। लेकिन पति-पत्नी में खटपट आम बात है। कारण विचारों का नहीं मिलना।पहले माता-पिता की पसंद से शादियां होती थी।अब बच्चों की पसंद से शादी होती है। अब तो कभी-कभी ऐसी परिस्थिति भी निर्मित हो जाती है कि माता-पिता को यहां तक कहना पड़ जाता है कि शादी लड़के से नहीं लड़की से ही करना। या लड़की है तो उसे कहा जाता है कि शादी लड़के से ही करना।हालांकि लाखों करोड़ों में एकाध ही ऐसा प्रकरण आता होगा।वर्तमान हालात को देखते हुए तो यही लगता है कि हम बहुत आधुनिक हो गये हैं। और हमारी भारतीय संस्कृति पाश्चात्य जीवन शैली में  कहीं गुम होती जा रही है। पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी की तरफ आशाभरी नज़रों से देख रही है।

श्रीमती रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार

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