अच्छे दिन आ रहे

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

धूल और धूँए के गुबार के बीच

लोहार की धौंकनी की तरह 

फूलता पिचकता फेफड़ा लिए

हाँफता बदहवास आदमी 

विकास की आंधी में तलाश रहा 

साफ हवा के चंद कतरे 

पर हाथ आ रही मायूसी ।

सड़कों पर जाम में फंसा , 

आगे बढ़ने की

हर जुगत कर रहा , पर भीड़ का रेला हर बार 

धकेल कर उसे वहीं पंहुचा दे रहा 

जहाँ से शुरू किया था उसने अपना सफर ।

तपते हुए कंकरीट के जंगल में 

मुठ्ठी भर छांव की तलाश 

आंखों में पसर गई है 

मोतियाबिंद की तरह ।

चौड़ी , चमकीली  सड़कों पर उभर आये गढ्ढे

और ढहाई गई पुरानी बस्तियों के मलबे

फुसफुसा रहे 

मत घबड़ा , अभी और

अच्छे दिन आ रहे ।

 प्रदीप कुमार